मैं जब भी याद की शमएँ जला के रखती हूँ

  - Rehana Qamar
मैंजबभीयादकीशमएँजलाकेरखतीहूँ
येमेरीज़िदहैकिआगेहवाकेरखतीहूँ
मैंटूटसकतीहूँलेकिनमैंझुकनहींसकती
शिकस्त-ए-ज़ातमेंपहलूअनाकेरखतीहूँ
वोबादबाँहैअगरकश्ती-ए-मोहब्बतका
मैंबादबानसेरिश्तेहवाकेरखतीहूँ
नहींहैघरमेंतेरीयादकेअलावाकुछ
तोकिसकेसामनेचायबनाकेरखतीहूँ
तुम्हारेख़तहैंमहकतेगुलाबकेमानिंद
वोऔरखुलतेहैंजितनाछुपाकेरखतीहूँ
जोकहनाचाहतीहूँवोतोकहनहींपाती
ज़बाँपेतज़्किरेआब-ओ-हवाकेरखतीहूँ
मैंजानतीहूँकिआनानहींकिसीने'क़मर'
मगरमुंडेरपेशमएँजलाकेरखतीहूँ
  - Rehana Qamar
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