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Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
kya mohabbat men ye sahi tha yaar
kya mohabbat men ye sahi tha yaar | क्या मोहब्बत में ये सही था यार
- Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
क्या
मोहब्बत
में
ये
सही
था
यार
जी
से
मैं
जी-हुज़ूरी
पे
आया
- Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
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रात
कैसे
सोने
दे
सकती
है
फिर
चाँद
को
गर
दिन-दहाड़े
देख
लो
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न
बंजर
देखी
जाती
है
न
ज़रख़ेज़
ये
जो
हम
ने
ज़मीं
छोड़ी
हुई
है
Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'
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खिलौना
आपका
है
जैसे
खेलो
बस
इतना
सोचना
प्यारा
बना
है
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और
तो
हुआ
ही
क्या
मुझ
से
हुनर
हुआ
ज़ाया'
मुझ
से
शहर
सदा
देते
थे
पर
छूटा
नहीं
शिमला
मुझ
से
कुछ
तो
प्यास
ही
कम
थी
कुछ
दूर
भी
था
दरिया
मुझ
से
वक़्त
था
वो
भी
आख़िर
का
क्या
ही
हो
पाता
मुझ
से
मैं
तो
मैं
था
आइना
भी
हाल
छुपाता
था
मुझ
से
ठेस
तो
ऐसी
लगा
ज़ालिम
हो
पाए
रोना
मुझ
से
छोड़
गया
ये
बात
भी
छोड़
मिल
कर
तो
जाता
मुझ
से
वो
मेरा
ही
जंगल
था
जिसका
पेड़
कटा
मुझ
से
जीत
में
अब
सर
झुकता
है
वो
ऐसे
हारा
मुझ
से
तन्हा
हो
पर
कैसे
हो
ये
क्या
पूछ
लिया
मुझ
से
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पहले
क़ाबिल
बनाएँगे
ये
हाथ
फिर
तेरे
हाथ
पे
रखेंगे
हाथ
हमने
क्या
तेरे
दर
को
खोलना
था
बस
निशाँ
के
लिए
लगाए
हाथ
तू
ज़बाँ
खोल
कुछ
क़दम
तो
उठा
कब
तलक
यूँँ
उठेंगे
उसके
हाथ
चाँद
तुझको
पकड़
तो
लेते
हम
पर
वहाँ
तक
नहीं
पहुँचते
हाथ
तूने
ही
भीड़
को
नहीं
देखा
वर्ना
मैंने
हिलाए
तो
थे
हाथ
तुम
भी
ले
आओ
कुछ
हया
ख़ुद
में
हम
ही
कब
तक
धरेंगे
आँख
पे
हाथ
मान
ले
है
जुदाई
क़िस्मत
में
छोड़
दे
अब
दिखाने
अपने
हाथ
जब
ज़रूरत
है
तो
अकेले
हैं
क्या
करें
था
में
ही
पराए
हाथ
याद
बे-होशी
की
वो
ही
है
मुझे
जब
जबीं
पे
रखा
था
माँ
ने
हाथ
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