phir maqaam-e-rifaqat pe mudgham hui | फिर मक़ाम-ए-रिफ़ाक़त पे मुदग़म हुईं

  - Rafiq Sandelvi
फिरमक़ाम-ए-रिफ़ाक़तपेमुदग़महुईं
सूइयाँदोनोंघड़ियालकी
रफ़्तआमदकेचक्करमें
घंटेकीआवाज़में
मेरादिलखोगया
अपनीटिक-टिकमें
बहतारहावक़्त
कितनासमयहोगया!
साल-हा-साल
पानीकेचश्मेंसे
गीलेकिएलबअनासिरने
जलतेअलावपे
हाथअपनेतापेमज़ाहिरने
सीनेकीधड़कनसे
ना-दीदकेरंग-ओ-रोग़नसे
अश्याने
बीनाईहासिलकी
मक़्सूमकेताक़चेसे
जहाँफूलरक्खेथे
लकड़ीकेसंदूक़चेसे
ख़ज़ानाउठालेगईरात
मुट्ठीसेगिरतेरहे
रेतकीमिस्लदिन!
एकदिनसहनकीपील-गूंधूपमें
आहनीचारपाईपेलेटेहुए
एकझपकीसीआई
तोमैंसोगया
मेरेचेहरेपे
बारिशकीइकबूँदने
गरकेदस्तकदी:
बाबाचलो,
अपनेकमरेकेअंदर
समयहोगया
  - Rafiq Sandelvi
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