saaz-e-furqat pe ghazal gaao ki kuchh raat kate | साज़-ए-फ़ुर्क़त पे ग़ज़ल गाओ कि कुछ रात कटे

  - Raees Akhtar
साज़-ए-फ़ुर्क़तपेग़ज़लगाओकिकुछरातकटे
प्यारकीरस्मकोचमकाओकिकुछरातकटे
जबयेतयहैकिग़म-ए-इश्क़बहुतकाफ़ीहै
ग़मकामफ़्हूमहीसमझाओकिकुछरातकटे
सुब्हकेसाथहीहमख़ुदभीबिखरजाएँगे
दो-घड़ीऔरठहरजाओकिकुछरातकटे
दामन-ए-दर्दपेबिखरेहुएआँसूकीतरह
मेरीपलकोंपेभीलहराओकिकुछरातकटे
ज़िक्र-ए-गुलज़ारसहीक़िस्सा-ए-दिल-दारसही
ज़ख़्मकेफूलहीमहकाओकिकुछरातकटे
एकएकदर्दकेसीनेमेंउतरकरदेखो
एकएकसाँसमेंलहराओकिकुछरातकटे
दिलकीवादीमेंहैतारीकघटाओंकाहुजूम
चाँदनीबनकेनिखरजाओकिकुछरातकटे
क़ातिल-ए-शहरसबचकरमैंअभीआयाहूँ
मैंअकेलाहूँचलेआओकिकुछरातकटे
फ़र्शकिरनोंकाबिछादेगीसहरके'रईस'
दिलकेज़ख़्मोंकोभीचमकाओकिकुछरातकटे
  - Raees Akhtar
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