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Rachit Sonkar
koi pahchaan uski nahin thii kabhi
koi pahchaan uski nahin thii kabhi | कोई पहचान उसकी नहीं थी कभी
- Rachit Sonkar
कोई
पहचान
उसकी
नहीं
थी
कभी
एक
दीवार
को
हमने
साया
दिया
- Rachit Sonkar
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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ज़िन्दगी
छीन
ले
बख़्शी
हुई
दौलत
अपनी
तूने
ख़्वाबों
के
सिवा
मुझ
को
दिया
भी
क्या
है
Akhtar Saeed Khan
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बिठा
दिया
है
सिपाही
के
दिल
में
डर
उसने
तलाशी
दी
है
दुपट्टा
उतार
कर
उसने
मैं
इसलिए
भी
उसे
ख़ुद-कुशी
से
रोकता
हूँ
लिखा
हुआ
है
मेरा
नाम
जिस्म
पर
उसने
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Zia Mazkoor
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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उसने
गले
से
हमको
लगाया
तो
रो
पड़े
अपना
बना
के
हाथ
छुड़ाया
तो
रो
पड़े
मैंने
ग़मों
से
कह
तो
दिया
रहना
उम्र
भर
वा'दा
ग़मों
ने
अपना
निभाया
तो
रो
पड़े
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Vikas Sahaj
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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कहाँ
चराग़
जलाएँ
कहाँ
गुलाब
रखें
छतें
तो
मिलती
हैं
लेकिन
मकाँ
नहीं
मिलता
Nida Fazli
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ऐसी
तारीकियाँ
आँखों
में
बसी
हैं
कि
'फ़राज़'
रात
तो
रात
है
हम
दिन
को
जलाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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दु'आ
करो
कि
सलामत
रहे
मिरी
हिम्मत
ये
इक
चराग़
कई
आँधियों
पे
भारी
है
Waseem Barelvi
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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किस
मुँह
से
बतलाएँ
तुमको
दिल
पर
मेरे
क्या
गुज़री
है
Rachit Sonkar
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ग़म
में
डूबे
रहो
ग़म
में
ग़ज़लें
कहो
दर्द
इतना
भी
अच्छा
नहीं
है
रचित
Rachit Sonkar
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मुफ़लिसी
में
ऐसी
हालत
हो
गई
है
मेरी
मर
जाने
की
सूरत
हो
गई
है
सोचता
था
छूट
जाएगी
किसी
दिन
पर
उदासी
मेरी
आदत
हो
गई
है
दोस्त
मिट्टी
डाल
के
जाते
हैं
ऐसे
ज़ीस्त
जैसे
क़ब्र
की
छत
हो
गई
है
पहले
जो
सीलन
मेरी
दीवार
पर
थी
अब
मेरे
चेहरे
की
रंगत
हो
गई
है
मैंने
कल
देखा
था
उस
को
घर
के
बाहर
और
भी
वो
ख़ूब-सूरत
हो
गई
है
डाँटते
हैं
उल्टे
वो
माता
पिता
को
बच्चों
की
अब
इतनी
हिम्मत
हो
गई
है
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Rachit Sonkar
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उसको
गले
लगाया
उसका
बदन
भी
चूमा
कल
रात
उसके
घर
की
बत्ती
चली
गई
थी
Rachit Sonkar
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ग़म
ग़ज़ल
में
ही
सुनाना
देखो
शा'इरी
का
है
ज़माना
देखो
मेरे
हाथों
में
है
पायल
उसकी
है
मेरे
पास
ख़ज़ाना
देखो
बात
धरती
की
गगन
तक
पहुँची
इक
हक़ीक़त
का
फ़साना
देखो
ज़ुल्फ़
खोली
है
हवा
में
उसने
अब्र
का
झूम
के
आना
देखो
उसने
आँखों
में
लगाया
सुरमा
इसको
कहते
है
लुभाना
देखो
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Rachit Sonkar
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