raaz-e-dil kyun na kahooñ saamne deewaanon ke | राज़-ए-दिल क्यूँँ न कहूँ सामने दीवानों के

  - Qamar Jalalvi
राज़-ए-दिलक्यूँँकहूँसामनेदीवानोंके
येतोवोलोगहैंअपनोंकेबेगानोंके
वोभीक्यादौरथेसाक़ीतिरेमस्तानोंके
रास्तेराहतकाकरतेथेमय-ख़ानोंके
बादलोंपरयेइशारेतिरेदीवानोंके
टुकड़ेपहुँचेहैंकहाँउड़केगरेबानोंके
रास्तेबंदकिएदेतेहोदीवानोंके
ढेरलगजाएँगेबस्तीमेंगरेबानोंके
अज़ाँदेताहुशियारबरहमनहोता
दरतोउसशैख़नेखुलवाएहैंबुतख़ानोंके
आपदिन-रातसँवाराकरेंगेसूतोक्या
कहींहालातबदलतेहैंपरेशानोंके
मनअ'करगिर्या-ए-शबनमपेयेफूलहँसें
लालेपड़जाएँगेबाद-ए-सबाजानोंके
क्याज़मानाथाउधरशामइधरहाथमेंजाम
सुब्हतकदौरचलाकरतेथेपैमानोंके
वोभीक्यादिनथेउधरशामइधरहाथमेंजाम
अबतोरस्तेभीरहेयादमय-ख़ानोंके
आजतकतोमिरीकश्तीनेपाईमंज़िल
क़ाफ़िलेसैंकड़ोंगुमहोगएतूफ़ानोंके
ख़ाक-ए-सहरापेलकीरेंहैंउन्हेंफिरदेखो
कहींयेख़तहोंलिक्खेहुएदीवानोंके
देखिएचर्ख़पेतारेभीहैंक्याबे-तरतीब
जैसेबिखरेहुएटुकड़ेमिरेपैमानोंके
हाथख़ालीहैंमगरमुल्क-ए-अदमकाहैसफ़र
हौसलेदेखिएउनबे-सर-ओ-सामानोंके
सरझुकाएहुएबैठेहैंजोका'बेमें'क़मर'
ऐसेहोतेहैंनिकालेहुएबुतख़ानोंके
  - Qamar Jalalvi
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