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Qaisar Ziya Qaisar
kya kahooñ zakham kitna gahra hai
kya kahooñ zakham kitna gahra hai | क्या कहूँ ज़ख़्म कितना गहरा है
- Qaisar Ziya Qaisar
क्या
कहूँ
ज़ख़्म
कितना
गहरा
है
दूर
तक
सिर्फ़
महज़
सहरा
है
हर
क़दम
पर
बगूले
रक़्साँ
हैं
राह
में
हर-सू
शो'ले
रक़्साँ
हैं
न
शजर
है
न
कोई
साया
है
कोई
चश्मा
न
कोई
दरिया
है
धूप
सर
पर
बरसती
रहती
है
प्यास
लब
पर
लरज़ती
रहती
है
तीरगी
चश्म-ए-तर
पे
तारी
है
और
सफ़र
है
कि
फिर
भी
जारी
है
- Qaisar Ziya Qaisar
आधी
रात
की
चुप
में
किस
की
चाप
उभरती
है
छत
पे
कौन
आता
है
सीढ़ियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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हम
तो
उसको
देखने
आए
थे
इतनी
दूर
से
वो
समझता
था
हमें
मेला
बहुत
अच्छा
लगा
Munawwar Rana
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इसलिए
नहीं
रोया
अश'आर
में
वज़्न
से
बाहर
थी
मेरी
सिसकियाँ
Saad Ahmad
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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शहर
गुम-सुम
रास्ते
सुनसान
घर
ख़ामोश
हैं
क्या
बला
उतरी
है
क्यूँँ
दीवार-ओ-दर
ख़ामोश
हैं
Azhar Naqvi
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किसी
ने
मुफ्त
में
वो
शख़्स
पाया
जो
हर
कीमत
पे
मुझको
चाहिए
था
Uzair Hijazi
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सुन
ओ
कहानीकार
कोई
ऐसा
रोल
दे
ऐसे
अदा
करूँं
मेरी
इज़्ज़त
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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जब
आँखों
में
लगाता
हूँ
तो
चुपके-चुपके
हंस-हंसकर
तेरी
तस्वीर
भी
कहती
है,
सूरत
ऐसी
होती
है
Dagh Dehlvi
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हाथ
टूटें
मैंने
गर
छेड़ी
हों
ज़ुल्फ़ें
आप
की
आप
के
सर
की
क़सम
बाद-ए-सबा
थी
मैं
न
था
Momin Khan Momin
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फिर
वही
रोना
मुहब्बत
में
गिला
शिकवा
जहाँ
से
रस्म
है
बस
इसलिए
भी
तुम
को
साल-ए-नौ
मुबारक
Neeraj Neer
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