tum se do harf ka khat bhi nahin likkha jaata | तुम से दो हर्फ़ का ख़त भी नहीं लिक्खा जाता

  - Qaisar-ul-Jafri
तुमसेदोहर्फ़काख़तभीनहींलिक्खाजाता
जाओअबयूँँभीतअ'ल्लुक़नहींतोड़ाजाता
दिलकाअहवालपूछोकिबहुतरोज़हुए
इसख़राबेकीतरफ़मैंनहींआताजाता
तिश्नगीनेकभीदरियाओंसेमिलनेदिया
हमजिधरजातेउसीराहमेंसहराजाता
ज़िंदगी!रहनेभीदेसोचकीहदहोतीहै
इतनासोचाहैकिसदियोंमेंसोचाजाता
उसकोअंदाज़-ए-तग़ाफ़ुलभीआयाअबतक
भूलनेहीकोसहीयादतोरक्खाजाता
हाएवोदौरकिआँसूभीथेआँखोंमें
औरचेहराथाकिबे-रोएभीभीगाजाता
भूलताहीनहींवोमरहला-ए-राज़-ओ-नियाज़
हममनातेतोकोईऔरभीरूठाजाता
पस-ए-दीवारकामंज़रभीगयाअपनेसाथ
सहन-ए-वीरानसेपत्थरकहाँफेंकाजाता
शामहोतेहीकोईशम्अजलारखनीथी
जबदरीचेसेहवाआतीतोदेखाजाता
रौशनीअपनेघरोंदोंमेंछुपीथीवर्ना
शहरकेशहरपेशब-ख़ूनमाराजाता
इतनेआँसूमिरीआँखोंमेंकहाँथे'क़ैसर'
उम्रभरदलकेजनाज़ेपेजोरोयाजाता
  - Qaisar-ul-Jafri
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