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Parveen Shakir
ik hunar tha kamaal tha kya tha
ik hunar tha kamaal tha kya tha | इक हुनर था कमाल था क्या था
- Parveen Shakir
इक
हुनर
था
कमाल
था
क्या
था
मुझ
में
तेरा
जमाल
था
क्या
था
तेरे
जाने
पे
अब
के
कुछ
न
कहा
दिल
में
डर
था
मलाल
था
क्या
था
बर्क़
ने
मुझ
को
कर
दिया
रौशन
तेरा
अक्स-ए-जलाल
था
क्या
था
हम
तक
आया
तू
बहर-ए-लुत्फ़-ओ-करम
तेरा
वक़्त-ए-ज़वाल
था
क्या
था
जिस
ने
तह
से
मुझे
उछाल
दिया
डूबने
का
ख़याल
था
क्या
था
जिस
पे
दिल
सारे
अहद
भूल
गया
भूलने
का
सवाल
था
क्या
था
तितलियाँ
थे
हम
और
क़ज़ा
के
पास
सुर्ख़
फूलों
का
जाल
था
क्या
था
- Parveen Shakir
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मोहब्बत
नेक-ओ-बद
को
सोचने
दे
ग़ैर-मुमकिन
है
बढ़ी
जब
बे-ख़ुदी
फिर
कौन
डरता
है
गुनाहों
से
Arzoo Lakhnavi
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बे-ख़ुदी
ले
गई
कहाँ
हम
को
देर
से
इंतिज़ार
है
अपना
Meer Taqi Meer
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उसने
पूछा
था
पहले
हाल
मेरा
फिर
किया
देर
तक
मलाल
मेरा
मैं
वफ़ा
को
हुनर
समझता
था
मुझपे
भारी
पड़ा
कमाल
मेरा
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Subhan Asad
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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देख
कैसे
धुल
गए
है
गिर्या-ओ-ज़ारी
के
बाद
आसमाँ
बारिश
के
बाद
और
मैं
अज़ादारी
के
बाद
इस
सेे
बढ़
कर
तो
तुझे
कोई
हुनर
आता
नहीं
सोचता
हूँ
क्या
करेगा
दिल
आज़ारी
के
बाद
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Abbas Tabish
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न
हों
अश'आर
में
माअनी
न
सही
ख़ुद
कलामी
का
ज़रिया
ही
सही
तुम
न
नवाज़ो
शे'र
को,
न
सुनाएंगे
ये
मेरा
ज़ाती
नज़रिया
ही
सही
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Unknown
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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इक
हुनर
है
जो
कर
गया
हूँ
मैं
सब
के
दिल
से
उतर
गया
हूँ
मैं
Jaun Elia
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नख़रे
उन
ख़्वाबों
के
बड़े
होंगे
जिनको
वो
रोज़
देखती
होगी
Harsh saxena
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पूरा
दुख
और
आधा
चाँद
हिज्र
की
शब
और
ऐसा
चाँद
दिन
में
वहशत
बहल
गई
रात
हुई
और
निकला
चाँद
किस
मक़्तल
से
गुज़रा
होगा
इतना
सहमा
सहमा
चाँद
यादों
की
आबाद
गली
में
घूम
रहा
है
तन्हा
चाँद
मेरी
करवट
पर
जाग
उठ्ठे
नींद
का
कितना
कच्चा
चाँद
मेरे
मुँह
को
किस
हैरत
से
देख
रहा
है
भोला
चाँद
इतने
घने
बादल
के
पीछे
कितना
तन्हा
होगा
चाँद
आँसू
रोके
नूर
नहाए
दिल
दरिया
तन
सहरा
चाँद
इतने
रौशन
चेहरे
पर
भी
सूरज
का
है
साया
चाँद
जब
पानी
में
चेहरा
देखा
तू
ने
किस
को
सोचा
चाँद
बरगद
की
इक
शाख़
हटा
कर
जाने
किस
को
झाँका
चाँद
बादल
के
रेशम
झूले
में
भोर
समय
तक
सोया
चाँद
रात
के
शाने
पर
सर
रक्खे
देख
रहा
है
सपना
चाँद
सूखे
पत्तों
के
झुरमुट
पर
शबनम
थी
या
नन्हा
चाँद
हाथ
हिला
कर
रुख़्सत
होगा
उस
की
सूरत
हिज्र
का
चाँद
सहरा
सहरा
भटक
रहा
है
अपने
इश्क़
में
सच्चा
चाँद
रात
के
शायद
एक
बजे
हैं
सोता
होगा
मेरा
चाँद
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खुली
आँखों
में
सपना
झाँकता
है
वो
सोया
है
कि
कुछ
कुछ
जागता
है
तिरी
चाहत
के
भीगे
जंगलों
में
मिरा
तन
मोर
बन
कर
नाचता
है
मुझे
हर
कैफ़ियत
में
क्यूँँ
न
समझे
वो
मेरे
सब
हवाले
जानता
है
मैं
उस
की
दस्तरस
में
हूँ
मगर
वो
मुझे
मेरी
रज़ा
से
माँगता
है
किसी
के
ध्यान
में
डूबा
हुआ
दिल
बहाने
से
मुझे
भी
टालता
है
सड़क
को
छोड़
कर
चलना
पड़ेगा
कि
मेरे
घर
का
कच्चा
रास्ता
है
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Parveen Shakir
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आइने
की
आँख
ही
कुछ
कम
न
थी
मेरे
लिए
जाने
अब
क्या
क्या
दिखाएगा
तुम्हारा
देखना
Parveen Shakir
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हुस्न
के
समझने
को
उम्र
चाहिए
जानाँ
दो
घड़ी
की
चाहत
में
लड़कियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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तेरे
सिवा
भी
कई
रंग
ख़ुश
नज़र
थे
मगर
जो
तुझको
देख
चुका
हो
वो
और
क्या
देखे
Parveen Shakir
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