zameen pe baith ke be-ikhtiyaar dhoondhta hooñ | ज़मीं पे बैठ के बे-इख़्तियार ढूँढता हूँ

  - Osaama ameer
ज़मींपेबैठकेबे-इख़्तियारढूँढताहूँ
मैंआसमानकागर्द-ओ-ग़ुबारढूँढताहूँ
मुझेपताहैकिसीमेंयेशयनहींमौजूद
हरएकशख़्समेंक्यूँँए'तिबारढूँढताहूँ
अकेलाबैठकेमस्जिदकेएककोनेमें
कमालकरताहूँपर्वरदिगारढूँढताहूँ
किआइनेमेंकईआईनेकिएतख़्लीक़
सोएकचेहरेमेंचेहरेहज़ारढूँढताहूँ
तुम्हारीयादतोरक्खीहैजेबमेंमैंने
येक्यूँँइधरसेउधरबारबारढूँढताहूँ
मैंऐसेआलम-ए-वहशतमेंहूँकितन्हाई
पुकारतीहैमुझेमैंपुकारढूँढताहूँ
मिरेलिएतोख़त-ए-इंतिज़ारखींचतीहै
तिरेलिएमैंख़त-ए-इंतिज़ारढूँढताहूँ
  - Osaama ameer
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