nigaar-e-subh ki ummeed men pighalte hue | निगार-ए-सुब्ह की उम्मीद में पिघलते हुए

  - Obaidullah Aleem
निगार-ए-सुब्हकीउम्मीदमेंपिघलतेहुए
चराग़ख़ुदकोनहींदेखताहैजलतेहुए
वोहुस्नउसकाबयाँक्याकरेजोदेखताहो
हरइकअदाकेकईक़दनएनिकलतेहुए
वोमौज-ए-मय-कदा-ए-रंगहैबदनउसका
किहैंतलातुम-ए-मयसेसुबूउछलतेहुए
तोज़र्राज़र्राउसआलमकाहैज़ुलेख़ासिफ़त
चलेजोदश्त-ए-बलामेंकोईसँभलतेहुए
येरूहखींचतीचलीजारहीहैकिसकीतरफ़
येपाँवक्यूँँनहींथकतेहमारेचलतेहुए
उसीकेनामकीख़ुशबूसेसाँसचलतीरहे
उसीकानामज़बाँपरहोदमनिकलतेहुए
ख़यालख़्वाबकेक्याक्यासिलसिलेनिकले
चराग़जलतेहुएआफ़्ताबढलतेहुए
अँधेरेहैंयहाँसूरजकेनामपररौशन
उजालोंसेयहाँदेखेहैंलोगजलतेहुए
उतारइनमेंकोईअपनीरौशनीयारब
किलोगथकगएज़ुल्मतसेअबबहलतेहुए
वोरहेहैंज़मानेकितुमभीदेखोगे
ख़ुदाकेहाथसेइंसानकोबदलतेहुए
वोसुब्हहोगीतोफ़िरऔनफिरगुज़़रेंगे
दिलोंकोरौंदतेइंसानकोमसलतेहुए
  - Obaidullah Aleem
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