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Nityanand Vajpayee
tum ab tak kasmasaate se ho yuñ jaise ki lajavantee
tum ab tak kasmasaate se ho yuñ jaise ki lajavantee | तुम अब तक कसमसाते से हो यूँँ जैसे कि लजवन्ती
- Nityanand Vajpayee
तुम
अब
तक
कसमसाते
से
हो
यूँँ
जैसे
कि
लजवन्ती
कोई
नज़रों
से
कमसिन
जिस्म
को
सहला
गया
था
क्या
- Nityanand Vajpayee
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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कुछ
इस
सलीक़े
से
माथे
पे
उसने
होंट
रखे
बदन
को
छोड़
के
सारी
थकन
को
चूम
लिया
Harsh saxena
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वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
Azm Shakri
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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दिसंबर
की
सर्दी
है
उसके
ही
जैसी
ज़रा
सा
जो
छू
ले
बदन
काँपता
है
Amit Sharma Meet
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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टूटा
तो
हूँ
मगर
अभी
बिखरा
नहीं
'फ़राज़'
मेरे
बदन
पे
जैसे
शिकस्तों
का
जाल
हो
Ahmad Faraz
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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हुस्न
को
हुस्न
बनाने
में
मिरा
हाथ
भी
है
आप
मुझ
को
नज़र-अंदाज़
नहीं
कर
सकते
Rais Farog
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ग़ज़ब
उगला
है
उसने
ज़हर
फिर
इंसानियत
कहकर
बहुत
हैरान
हूँ
मैं
उसकी
इस
फिरक़ा-परस्ती
से
कई
हिस्सों
में
अब
उस
मुल्क
के
कहने
लगे
हैं
लोग
हुए
बर्बाद
हैं
हम
ख़ुद
की
इस
फ़िरक़ा-परस्ती
से
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Nityanand Vajpayee
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मुंतशिर
हूँ
तू
एकसर
कर
दे
मेरी
ज़ानिब
जो
इक
नज़र
कर
दे
मानता
हूँ
कि
मैं
हूँ
बेढब
पर
तू
जो
चाहे
तो
मुख़्तसर
कर
दे
ज़िन्दगी
मौत
का
उधार
सही
एक
पल
को
ही
उम्र
भर
कर
दे
अब
तलक़
सो
रहा
हूँ
दुनिया
में
मुझको
जागा
हुआ
बशर
कर
दे
नाख़ुदा
तू
न
रूठ
यूँँ
मुझ
सेे
'नित्य'
कश्ती
मेरी
उधर
कर
दे
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Nityanand Vajpayee
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तुम्हें
पाकर
मुकम्मल
हो
गई
है
ज़िंदगानी
कोई
ख़्वाहिश
हमारे
दिल
में
अब
बाक़ी
नहीं
है
Nityanand Vajpayee
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सिर्फ़
होली
ही
नहीं
ईद
पे
भी
रंग
उड़ेल
हिंदवी
साख़
में
बढ़वार
यूँँ
नाबाद
रहे
रंग
ऐसा
कि
तमाम
उम्र
नहीं
छूटे
फिर
रिश्ता
ऐसा
कि
क़यामत
में
भी
आबाद
रहे
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Nityanand Vajpayee
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घोड़ों
को
नहीं
घास
गधों
को
है
पँजीरी
अब
दौर
ही
ऐसा
है
भला
दोष
किसे
दें
Nityanand Vajpayee
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