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Nikunj Rana
uske dil se koi aaKHir ham nikaalen aur kaise
uske dil se koi aaKHir ham nikaalen aur kaise | उसके दिल से कोई आख़िर हम निकालें और कैसे
- Nikunj Rana
उसके
दिल
से
कोई
आख़िर
हम
निकालें
और
कैसे
जो
हक़ीक़त
है
हक़ीक़त
को
भुला
दें
और
कैसे
- Nikunj Rana
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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मसअला
ख़त्म
हुआ
चाहता
है
दिल
बस
अब
ज़ख़्म
नया
चाहता
है
Shakeel Jamali
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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चलता
रहने
दो
मियाँ
सिलसिला
दिलदारी
का
आशिक़ी
दीन
नहीं
है
कि
मुकम्मल
हो
जाए
Abbas Tabish
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दिल-ए-नादाँ
तुझे
हुआ
क्या
है
आख़िर
इस
दर्द
की
दवा
क्या
है
Mirza Ghalib
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ये
रख
रखाव
कभी
ख़त्म
होने
वाला
नहीं
बिछड़ते
वक़्त
भी
तुझको
गुलाब
दूँगा
मैं
Khurram Afaq
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सोचता
हूँ
कि
उस
की
याद
आख़िर
अब
किसे
रात
भर
जगाती
है
Jaun Elia
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दिल
कहीं
ये
फिर
से
हरकत
में
न
आए
शख़्स
कोई
फिर
मुसीबत
में
न
आए
Nikunj Rana
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हमें
तो
तन्हाई
ने
मारा
तुम्हारी
जुदाई
ने
मारा
ज़ुल्फ़ों
में
निगाहे
छुपाना
नज़र
की
तबाही
ने
मारा
बहुत
सी
पढ़ी
है
किताबे
हुनर
की
पढाई
ने
मारा
बुरा
तो
बहुत
है
जमाना
तुम्हारी
भलाई
ने
मारा
भरी
रंग
से
है
फ़िज़ाएं
सजी
ये
कलाई
ने
मारा
तुम्हें
हो
ख़ुशी
हर
मुबारक
हमें
तो
दुहाई
ने
मारा
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Nikunj Rana
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हमें
भी
कर
दे
इस
ज़िद
से
रिहा
तू
ज़रा
मिल
कर
दे
बस
ख़ुद
से
जुदा
तू
Nikunj Rana
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मैं
यूँँ
ही
हर
एक
शख़्स
के
साथ
जाम
पे
तो
नहीं
आता
ये
दिल
बड़ा
तो
बहुत
हैं
लेकिन
तमाम
पे
तो
नहीं
आता
Nikunj Rana
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हमने
देखी
गुलाब
सी
सूरत
कैसी
कैसी
गुलाब
सी
सूरत
इक
नज़र
देख
ही
नहीं
पाए
याद
आई
गुलाब
सी
सूरत
पूछते
हो
की
ज़िंदगी
क्या
हैं
मुस्कुराती
गुलाब
सी
सूरत
तंग
रहता
हैं
जब
से
आईना
क्यूँ
सजी
थी
गुलाब
सी
सूरत
हमने
फिर
से
हथेली
फैलाई
जब
भी
बिखरी
गुलाब
सी
सूरत
अब
भी
मासूमियत
पे
मरते
हो
हैं
तबाही
गुलाब
सी
सूरत
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Nikunj Rana
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