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Naviii dar b dar
zindagi ko yuñ phir aazmaane ke baad
zindagi ko yuñ phir aazmaane ke baad | ज़िन्दगी को यूँँ फिर आज़माने के बाद
- Naviii dar b dar
ज़िन्दगी
को
यूँँ
फिर
आज़माने
के
बाद
कुछ
भी
तो
अब
नहीं
है
ज़माने
के
बाद
कैसे
ख़ुद
को
भी
दे
अब
तसल्ली
यहाँ
पे
कैसे
ग़म
में
है
वो
गुनगुनाने
के
बाद
- Naviii dar b dar
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तारों
को
गिनना
यूँँ
क़िस्मत
में
भी
होगा
बस
ग़मों
के
आने
की
तस्दीक़
तो
हो
Naviii dar b dar
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किताबों
के
जो
शे'र
ख़ुश
हैं
मिटाकर
वो
तहरीर
दिल
की
मिटाओगे
कैसे
Naviii dar b dar
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मुहब्बत
को
यूँँ
आज़माने
से
पहले
अदावत
तो
होगी
ज़माने
से
पहले
ये
दिल
भी
अभी
कितने
ही
टूटेंगे
जब
है
रिश्ता
ये
नाज़ुक
निभाने
से
पहले
किसी
की
कहानी
रहेगी
सलामत
कोई
होगा
तन्हा
भुलाने
से
पहले
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वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
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हर
शख़्स
में
नीयत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
मैं
बात
की
औसत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
आदमी
क्यूँ
आदमी
का
अब
यहाँ
दुश्मन
उस
खोई
'अक़ीदत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
नफ़रतों
का
घर
यहाँ
भी
हर
किसी
का
मन
मैं
दिल
से
मुहब्बत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
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Naviii dar b dar
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