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Naviii dar b dar
zindagi ka ye sach tab pata yuñ chala
zindagi ka ye sach tab pata yuñ chala | ज़िन्दगी का ये सच तब पता यूँँ चला
- Naviii dar b dar
ज़िन्दगी
का
ये
सच
तब
पता
यूँँ
चला
हमने
भी
दोस्ती
जब
किताबों
से
की
- Naviii dar b dar
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मुहब्बत
में
वादे
निभाए
गए
थे
तभी
ताज
देखो
है
ज़िंदा
निशानी
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विचारों
के
मंथन
से
निकली
ग़ज़ल
कई
साथ
छोड़े
है
पिछली
ग़ज़ल
किसी
को
सँभलने
का
मौक़ा
नहीं
यही
कहती
है
मेरी
अगली
ग़ज़ल
ज़बाँ
को
भी
रक्खा
हिसाबों
से
बस
चुभेगी
दिलों
में
ये
अहली
ग़ज़ल
इन
आँखों
में
जो
दर्द
देखे
यहाँ
सही
मायने
में
है
असली
ग़ज़ल
कई
मर्तबा
लफ़्ज़
चुभने
लगे
अधूरी
रही
बस
अधूरी
ग़ज़ल
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Naviii dar b dar
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किसकी
आँखों
में
समाए
रहते
हो
इश्क़
की
दुनिया
बसाए
रहते
हो
इक
नज़र
यूँँ
मुस्कुराके
देखो
भी
दिल
को
तुम
मेरे
जलाए
रहते
हो
प्यार
हम
सेे
तो
कहाँ
करते
हो
तुम
सारी
दुनिया
को
रिझाए
रहते
हो
आँखों
ही
आँखों
में
कहके
बात
को
हमको
बस
यूँँ
ही
सताए
रहते
हो
दिल
को
भी
यूँँ
हम
तसल्ली
कैसे
दें
आँखों
में
ऐसे
ही
छाए
रहते
हो
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पाने
को
इक
हसीं
ख़्वाब
का
जो
नगर
बस
भटकता
रहा
यूँँ
नवी
दर-ब-दर
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मुझको
मौत
भी
आए
तो
कुछ
इस
तरह
आए
मेरी
साँस
ठहरी
हो
और
ज़माना
हो
ग़म
में
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