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Naviii dar b dar
vichaaron ke manthan se nikli ghazal
vichaaron ke manthan se nikli ghazal | विचारों के मंथन से निकली ग़ज़ल
- Naviii dar b dar
विचारों
के
मंथन
से
निकली
ग़ज़ल
कई
साथ
छोड़े
है
पिछली
ग़ज़ल
किसी
को
सँभलने
का
मौक़ा
नहीं
यही
कहती
है
मेरी
अगली
ग़ज़ल
ज़बाँ
को
भी
रक्खा
हिसाबों
से
बस
चुभेगी
दिलों
में
ये
अहली
ग़ज़ल
इन
आँखों
में
जो
दर्द
देखे
यहाँ
सही
मायने
में
है
असली
ग़ज़ल
कई
मर्तबा
लफ़्ज़
चुभने
लगे
अधूरी
रही
बस
अधूरी
ग़ज़ल
- Naviii dar b dar
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ख़बर
ऐसी
असर
दिल
में
भी
कर
जाए
यूँँ
दीवाना
वो
ख़ुद
भी
तो
हो
कर
जाए
मुहब्बत
हो
ही
जाए
यूँँ
किसी
से
अब
कोई
तो
बाहों
में
भी
यूँँ
बिखर
जाए
उसे
जो
देखकर
भी
ऐसा
हो
जाए
मुझे
देखे
जो
ख़ुद
भी
वो
निखर
जाए
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हर
शख़्स
में
नीयत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
मैं
बात
की
औसत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
आदमी
क्यूँ
आदमी
का
अब
यहाँ
दुश्मन
उस
खोई
'अक़ीदत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
नफ़रतों
का
घर
यहाँ
भी
हर
किसी
का
मन
मैं
दिल
से
मुहब्बत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
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मुहब्बत
में
वादे
निभाए
गए
थे
तभी
ताज
देखो
है
ज़िंदा
निशानी
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नहीं
होता
यूँँ
आसाँ
जहाँ
मिलना
है
कितनी
ठोकरों
ने
ज़मीं
चूमी
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यूँँ
तो
हर
उलझनों
से
उलझा
पड़ा
हूँ
मैं
पर
फिर
भी
ज़िन्दगी
में
डटकर
खड़ा
हूँ
मैं
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