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Naviii dar b dar
vo alag kirdaar men dikhta hai ab to
vo alag kirdaar men dikhta hai ab to | वो अलग किरदार में दिखता है अब तो
- Naviii dar b dar
वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
तो
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
तो
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
भी
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
तो
- Naviii dar b dar
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अभी
वक़्त
थोड़ा
ठहर
यूँँ
तलबगार
हूँ
मंज़िलों
का
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विचारों
के
मंथन
से
निकली
ग़ज़ल
कई
साथ
छोड़े
है
पिछली
ग़ज़ल
किसी
को
सँभलने
का
मौक़ा
नहीं
यही
कहती
है
मेरी
अगली
ग़ज़ल
ज़बाँ
को
भी
रक्खा
हिसाबों
से
बस
चुभेगी
दिलों
में
ये
अहली
ग़ज़ल
इन
आँखों
में
जो
दर्द
देखे
यहाँ
सही
मायने
में
है
असली
ग़ज़ल
कई
मर्तबा
लफ़्ज़
चुभने
लगे
अधूरी
रही
बस
अधूरी
ग़ज़ल
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Naviii dar b dar
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यूँँ
कभी
मिल
मुझे
ओ
राह
दिखाने
वाले
हैं
तो
दुनिया
में
भी
मौजूद
निशाने
वाले
अब
तो
ये
चैन
सुकूँ
कैसे
उड़ा
देते
हैं
कैसे
हँसते
हैं
सितम
दे
के
ज़माने
वाले
जो
रही
बात
मेरी
तुम
भी
अमल
कर
देखो
अब
नहीं
मिलते
यूँँ
आइना
दिखाने
वाले
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Naviii dar b dar
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मंज़िलें
यूँँ
भी
तो
हासिल
हैं
ही
वो
सब
मुझको
रास्ता
पर
तुझे
पाने
का
नहीं
है
कोई
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अब
तो
शायद
ही
कभी
यूँँ
भूल
पाएँ
हम
ताज़ा
है
अब
भी
वो
तेरे
शहर
की
यादें
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