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Naviii dar b dar
koii khaamosh jo baitha man men
koii khaamosh jo baitha man men | कोई ख़ामोश जो बैठा मन में
- Naviii dar b dar
कोई
ख़ामोश
जो
बैठा
मन
में
हर
तरफ़
धूल
है
अब
आँगन
में
चाह
कर
भी
नहीं
जाता
दिल
से
उलझा
कर
है
गया
वो
बचपन
में
- Naviii dar b dar
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आज
फिर
से
वही
दिन
भी
तन्हाई
में
और
ये
रात
ख़ामोशी
में
गुज़री
है
Naviii dar b dar
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भला
आँखों
के
भँवर
में
फॅंसे
निकलेंगे
कहाँ
हमें
तो
इश्क़
की
गहराई
का
अंदाज़ा
नहीं
Naviii dar b dar
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उम्मीद
को
इम्कान
माना
जाएगा
यूँँ
दर्द
को
मेहरान
माना
जाएगा
जब
राह
मंज़िल
की
बहुत
हो
दूर
तो
उस
राह
को
अंजान
माना
जाएगा
ठोकर
को
सीने
से
लगाए
बैठा
हो
तब
हार
को
आसान
माना
जाएगा
इस
इश्क़
में
मुझको
मिला
है
क्या
से
क्या
क्या
प्यार
को
नुक़सान
माना
जाएगा
सैलाब
है
सीने
में
यूँँ
रक्खा
हुआ
ख़ामोशी
को
तूफ़ान
माना
जाएगा
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Naviii dar b dar
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हर
किसी
की
ज़रूरत
बदल
देते
हैं
झगड़े
जो
घर
की
सूरत
बदल
देते
हैं
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उम्र
होती
नहीं
बाँकपन
के
लिए
कर
गुज़रने
की
ख़्वाहिश
चमन
के
लिए
एक
तिरंगे
में
जो
लौट
के
आए
तो
जाँ
लुटा
देंगे
हम
इस
वतन
के
लिए
मुफ़लिसी
में
कहाँ
अब
जिए
आदमी
वोट
भी
बिक
गए
अब
कफ़न
के
लिए
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Naviii dar b dar
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