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Naviii dar b dar
hai ajab sii bhi rivaayat ab zamaane men yahaañ
hai ajab sii bhi rivaayat ab zamaane men yahaañ | है अजब सी भी रिवायत अब ज़माने में यहाँ
- Naviii dar b dar
है
अजब
सी
भी
रिवायत
अब
ज़माने
में
यहाँ
दूर
होते
हैं
तो
भी
आँखों
को
ग़म
दे
जाते
हैं
- Naviii dar b dar
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यादों
के
भी
सहारे
धरे
रह
गए
दुनिया
में
इश्क़
सारे
धरे
रह
गए
हाथ
तो
थाम
ही
जब
लिया
और
का
थे
जो
क़िस्से
हमारे
धरे
रह
गए
अब
तो
जीना
भी
मुश्किल
यूँँ
लगता
ही
है
बातों
के
वो
किनारे
धरे
रह
गए
अक़्ल
मर
ही
गई
प्यार
में
भी
सनम
सब
मुहब्बत
के
मारे
धरे
रह
गए
कुछ
तो
आँखों
का
जादू
था
उसने
किया
भटके
भूले
वो
प्यारे
धरे
रह
गए
बात
उनकी
रही
ज़िक्र
में
ही
सदा
क़िस्से
सारे
के
सारे
धरे
रह
गए
हो
गए
एक
सारे
ज़माने
में
अब
इक
'नवी'
जो
कुँवारे
धरे
रह
गए
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किस
सफ़र
को
यूँँ
भला
तन्हा
ही
समझें
दोस्तों
हर
सफ़र
में
उसकी
यादें
साथ
चलती
हैं
मेरे
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यूँँ
तो
ज़माने
में
अच्छी
भी
तर्बियत
रखते
हैं
कुछ
रौशन
हो
के
भी
अंधेरे
की
अहमियत
रखते
हैं
कुछ
हैं
जानते
क़द्र
इंसा
की
दिल
से
होती
यहाँ
पर
बस
इसलिए
अब
भी
दिल
में
इंसानियत
रखते
हैं
कुछ
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किताबों
के
तो
शे'र
ख़ुश
हैं
मिटाकर
वो
तहरीर
दिल
की
मिटाओगे
कैसे
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ज़मीं
पे
आसमाँ
पिघला
हुआ
ही
पाओगे
समय
यूँँ
हाथों
से
निकला
हुआ
ही
पाओगे
किसी
के
वास्ते
ख़ुद
को
सँवार
कर
देखो
तुम
अपने
आप
को
बदला
हुआ
ही
पाओगे
बने
रहेंगे
ज़माने
में
यूँँ
सितमगर
भी
ज़माने
भर
को
यूँँ
पगला
हुआ
ही
पाओगे
किसी
की
याद
में
दिन
रात
गर
यूँँ
तड़पे
हो
यूँँ
प्यासे
दिल
को
तो
मचला
हुआ
ही
पाओगे
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Naviii dar b dar
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