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Naviii dar b dar
Wo alag kirdaar mein dikhta hai ab
वो अलग किरदार में दिखता है अब
- Naviii dar b dar
वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
फीके
रह
जाते
हैं
सारे
छल
यहाँ
द्वन्द
भी
बाज़ार
में
दिखता
है
अब
- Naviii dar b dar
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रास्ता
ही
नहीं
दिल
में
भी
जाने
को
कितने
ही
ढब
किए
यूँँ
तुझे
पाने
को
Naviii dar b dar
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एक
ख़्वाहिश
को
तो
हमने
भी
है
बुन
रक्खा
नवी
अब
ज़िंदगी
में
कोई
आए
और
मुझे
अपना
बना
ले
Naviii dar b dar
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हर
शख़्स
की
नीयत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
मैं
बात
की
औसत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
आदमी
क्यूँ
आदमी
का
अब
यहाँ
दुश्मन
उस
खोई
'अक़ीदत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
जो
हो
रहा
है
मुल्क
में
ये
नफ़रतों
का
दौर
मैं
दिल
से
भी
अज़्मत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
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Naviii dar b dar
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यूँँ
दिल
पे
हुए
हैं
सितम
कैसे
कैसे
हैं
बहके
से
मेरे
क़दम
कैसे
कैसे
मुहब्बत
के
मारो
से
तुम
ये
न
पूछो
गुज़ारा
है
हर
दिन
सनम
कैसे
कैसे
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सिमट
के
रह
गया
वो
उलझनों
में
ही
सँभाले
रक्खा
था
जिस
वक़्त
को
मैंने
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