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Naviii dar b dar
prem men nikhra hua hooñ aajkal
prem men nikhra hua hooñ aajkal | प्रेम में निखरा हुआ हूँ आजकल
- Naviii dar b dar
प्रेम
में
निखरा
हुआ
हूँ
आजकल
हर
तरफ़
बिखरा
हुआ
हूँ
आजकल
कोई
जबसे
आया
है
जीवन
में
यूँँ
तब
से
ही
ठहरा
हुआ
हूँ
आजकल
हर
तरफ़
रंगीन
लगता
है
मुझे
बस
यूँँ
ही
गहरा
हुआ
हूँ
आजकल
- Naviii dar b dar
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वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
तो
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
तो
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
भी
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
तो
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ग़म
को
तुम
जब
भी
यूँँ
छुपाते
हो
अक्सर
लगता
है
पहले
भी
तुम्हें
ग़म
मिला
है
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मैं
अधूरे
ख़्वाब
लेके
चल
दिया
अब
दर्द
का
हर
आब
लेके
चल
दिया
अब
यार
देखा
था
कभी
जो
ख़्वाब
को
यूँँ
दिल
का
वो
एक
बाब
लेके
चल
दिया
अब
जब
से
मेरी
शाम
भी
तो
क्यूँ
है
तन्हा
उसके
दिल
से
याब
लेके
चल
दिया
अब
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झूठे
वचन
कितने
निभाए
जाएँगे
आकर
वो
ख़्वाबों
में
सताए
जाएँगे
होगा
ज़मीं
से
जब
कभी
भी
सामना
दिन
में
भी
तारे
यूँँ
दिखाए
जाएँगे
मुफ़्लिस
यहाँ
भी
डूबकर
चुपचाप
है
यूँँ
राज़
दुनिया
से
छुपाए
जाएँगे
कर
के
वो
दावे
जब
तुम्हें
ललचाएँ
तो
मुफ़लिस
यहाँ
अक्सर
लुभाए
जाएँगे
2212
2212
2212
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यूँँ
लौटेंगे
कभी
फिर
वो
हसीं
दिन
भी
ये
नफ़रत
भी
दिलों
से
मिट
ही
जाएगी
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