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Naviii dar b dar
muyassar yuñ hokar ke jo guzri hai
muyassar yuñ hokar ke jo guzri hai | मुयस्सर यूँँ होकर के जो गुज़री है
- Naviii dar b dar
मुयस्सर
यूँँ
होकर
के
जो
गुज़री
है
ये
दिल
को
भी
खोकर
के
जो
गुज़री
है
वो
जब
से
गया
आशियाने
से
यूँँ
वो
हर
रात
रोकर
के
जो
गुज़री
है
फ़ज़ाओं
से
अब
मन
नहीं
लग
रहा
ये
ग़म
साथ
होकर
के
जो
गुज़री
है
हसीं
ख़्वाब
में
भी
जगाया
गया
खुली
आँखें
सोकर
के
जो
गुज़री
है
तरस
सी
गई
आँखें
देखे
'नवी'
ये
आँसू
भिगोकर
के
जो
गुज़री
है
- Naviii dar b dar
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तो
कभी
ये
ज़मीं
आसमाँ
की
तलब
अब
कहाँ
ख़त्म
होती
जहाँ
की
तलब
बात
कह
के
गुज़ारी
यूँँ
ही
रात
भर
इश्क़
को
भी
कहाँ
अब
गुमाँ
की
तलब
आँख
भी
देखे
जो
और
सिर
ले
झुका
दिल
को
है
ऐसे
ही
रहनुमा
की
तलब
यार
मुझको
कमी
एक
है
खल
रही
ढूँढता
दिल
तो
है
दास्ताँ
की
तलब
वस्ल
और
हिज्र
के
कश्मकश
में
'नवी'
मुझ
को
तो
एक
ऐसे
मकाँ
की
तलब
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कभी
जो
इक
नज़र
मुझ
को
भी
उन
की
दीद
हो
मैं
इस
उम्मीद
से
ख़ुद
को
सँभाले
रक्खा
हूँ
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मुहब्बत
ने
सबको
किनारा
दिया
है
किसी
शख़्स
का
यूँँ
सहारा
दिया
है
जिसे
मानता
है
ये
सारा
ज़माना
मुक़द्दस
ये
रिश्ता
भी
प्यारा
दिया
है
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अभी
दिल
के
हर
साज़
बदले
हुए
हैं
मुहब्बत
के
आग़ाज़
बदले
हुए
हैं
यहाँ
दोस्ती
भी
समझकर
ही
करना
ज़माने
के
अंदाज़
बदले
हुए
हैं
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मुहब्बत
हमें
हो
कहाँ
से
भला
हमें
ग़म
है
हासिल
यहाँ
से
भला
ये
हस्ती
ये
बस्ती
भी
तेरी
रही
मुझे
क्या
मिला
इस
जहाँ
से
भला
किसी
की
कहानी
किसी
की
नहीं
मुहब्बत
सिखाऍं
कहाँ
से
भला
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