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Nasir Kazmi
musalsal bekli dil ko rahi hai
musalsal bekli dil ko rahi hai | मुसलसल बेकली दिल को रही है
- Nasir Kazmi
मुसलसल
बेकली
दिल
को
रही
है
मगर
जीने
की
सूरत
तो
रही
है
मैं
क्यूँँ
फिरता
हूँ
तन्हा
मारा
मारा
ये
बस्ती
चैन
से
क्यूँँ
सो
रही
है
चले
दिल
से
उम्मीदों
के
मुसाफ़िर
ये
नगरी
आज
ख़ाली
हो
रही
है
न
समझो
तुम
इसे
शोर-ए-बहाराँ
ख़िज़ाँ
पत्तों
में
छुप
कर
रो
रही
है
हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
- Nasir Kazmi
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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किसी
किसी
को
नसीब
हैं
ये
उदासियाँ
भी
किसी
को
ये
भी
बता
न
पाए
उदास
लड़के
Vikas Sahaj
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ये
किस
मक़ाम
पे
लाई
है
ज़िंदगी
हम
को
हँसी
लबों
पे
है
सीने
में
ग़म
का
दफ़्तर
है
Hafeez Banarasi
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मेरे
तो
ग़म
भी
ज़माने
के
काम
आते
हैं
मैं
रो
पड़ूँ
तो
कई
लोग
मुस्कुराते
हैं
Tariq Qamar
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दूजों
का
दुख
समझने
को
बे
हद
ज़रूरी
है
थोड़ी
सही
प
दिल
में
अज़ीयत
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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अपनी
तबाहियों
का
मुझे
कोई
ग़म
नहीं
तुम
ने
किसी
के
साथ
मोहब्बत
निभा
तो
दी
Sahir Ludhianvi
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे
माथे
पर
जो
दुख
लिक्खे
हैं
इनको
चूम
के
अपना
कर
लूंँगा
मैं
Aarush Sarkaar
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उदास
लोग
इसी
बात
से
हैं
ख़ुश
कि
चलो
हमारे
साथ
हुए
हादसों
की
बात
हुई
Abhishar Geeta Shukla
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जैसे
उदास
करने
मुझे
आई
ईद
हो
तेरे
बगैर
कैसी
मिरी,
माई
ईद
हो
Sayeed Khan
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तेरे
आने
का
धोखा
सा
रहा
है
दिया
सा
रात
भर
जलता
रहा
है
अजब
है
रात
से
आँखों
का
आलम
ये
दरिया
रात
भर
चढ़ता
रहा
है
सुना
है
रात
भर
बरसा
है
बादल
मगर
वो
शहर
जो
प्यासा
रहा
है
वो
कोई
दोस्त
था
अच्छे
दिनों
का
जो
पिछली
रात
से
याद
आ
रहा
है
किसे
ढूंढोगे
इन
गलियों
में
नासिर
चलो
अब
घर
चलें
दिन
जा
रहा
है
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Nasir Kazmi
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ख़्वाब
में
रात
हम
ने
क्या
देखा
आँख
खुलते
ही
चाँद
सा
देखा
कियारियाँ
धूल
से
अटी
पाईं
आशियाना
जला
हुआ
देखा
फ़ाख़्ता
सर-निगूँ
बबूलों
में
फूल
को
फूल
से
जुदा
देखा
उस
ने
मंज़िल
पे
ला
के
छोड़
दिया
उम्र
भर
जिस
का
रास्ता
देखा
हम
ने
मोती
समझ
के
चूम
लिया
संग-रेज़ा
जहाँ
पड़ा
देखा
कम-नुमा
हम
भी
हैं
मगर
प्यारे
कोई
तुझ
सा
न
ख़ुद-नुमा
देखा
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Nasir Kazmi
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शहर
सुनसान
है
किधर
जाएँ
ख़ाक
हो
कर
कहीं
बिखर
जाएँ
रात
कितनी
गुज़र
गई
लेकिन
इतनी
हिम्मत
नहीं
कि
घर
जाएँ
यूँँ
तेरे
ध्यान
से
लरज़ता
हूँ
जैसे
पत्ते
हवा
से
डर
जाएँ
उन
उजालों
की
धुन
में
फिरता
हूँ
छब
दिखाते
ही
जो
गुज़र
जाएँ
रैन
अँधेरी
है
और
किनारा
दूर
चाँद
निकले
तो
पार
उतर
जाएँ
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Nasir Kazmi
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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