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nakul kumar
mira kuchh bhi nahin mujh
mira kuchh bhi nahin mujh | मिरा कुछ भी नहीं मुझ
- nakul kumar
मिरा
कुछ
भी
नहीं
मुझ
में
ज़रा
भी
यही
इक
तौर
है
क्या
अब
तिरा
भी
लिया
पैसा
उधारी
दोस्तों
से
तुझे
मथुरा
घुमाया
आगरा
भी
- nakul kumar
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तू
अगर
हासिल
नहीं
तो
सब
बराबर
हैं
इधर
दोस्ती
भी
दुश्मनी
भी
मौत
क्या
महबूब
भी
nakul kumar
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हम
किसी
को
राह
में
कुछ
देर
भी
तक
लें
अगर
पागलों
को
जो
मिले
तो
सब
के
सब
पागल
मिले
nakul kumar
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मुझे
पानी
जो
अब
लाकर
दिया
है
किसी
प्यासे
के
घर
मातम
हुआ
है
तू
जिस
सेे
रौशनी
पाता
है
दिन
में
किसी
के
घर
का
ये
बुझता
दिया
है
मुझे
आदत
सी
है
अब
तो
तपन
की
तभी
सूरज
पे
मैंने
घर
लिया
है
मुझे
बरसों
से
कोई
भूख
सी
है
कि
मैंने
ख़ुद
को
ही
अब
खा
लिया
है
सभी
के
जिस्म
पीले
पड़
गए
हैं
लहू
मेरा
यहाँ
जिस
ने
पिया
है
मैं
रुकता
हूँ
सदा
शमशान
जाकर
मिरे
अंदर
कोई
मरकर
जिया
है
मैं
ख़ुद
ही
दाँव
पे
हूँ
अपनी
ख़ातिर
ये
मेरी
ज़िंदगी
है
या
जुआ
है
मिरे
जीने
की
आशा
बिन
तुम्हारे
दु'आ
के
साथ
कोई
बद्दुआ
है
किसी
के
इश्क़
में
मारा
गया
हूँ
तिरे
धोखे
में
ये
धोखा
हुआ
है
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nakul kumar
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तन्हा
रहता
हूँ
अक्सर
ही
हर
एक
का
फिर
हो
जाता
हूँ
हो
जाता
हूँ
जैसे
दुनिया
फिर
ख़ुद
में
ही
खो
जाता
हूँ
चुपचाप
पड़ा
हूँ
कोने
में
ग़म
दर्द
जुदाई
साथ
लिए
जब
नींद
कभी
आ
जाए
तो
ख़्वाबों
को
बिछा
सो
जाता
हूँ
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nakul kumar
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आ
गई
सब
कुछ
गँवा
कर
तुझको
पाने
की
घड़ी
और
फिर
सब
कुछ
गँवाना
मेरी
फ़ितरत
हो
गई
ज़िंदगानी
जीने
दे
तो
जी
भी
लें
हम
कुछ
घड़ी
ये
मगर
क्या
हो
गया
है
फिर
मुहब्बत
हो
गई
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nakul kumar
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