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nakul kumar
aa gaii sab kuchh ganwa kar tujhko paane kii ghadi
aa gaii sab kuchh ganwa kar tujhko paane kii ghadi | आ गई सब कुछ गँवा कर तुझको पाने की घड़ी
- nakul kumar
आ
गई
सब
कुछ
गँवा
कर
तुझको
पाने
की
घड़ी
और
फिर
सब
कुछ
गँवाना
मेरी
फ़ितरत
हो
गई
ज़िंदगानी
जीने
दे
तो
जी
भी
लें
हम
कुछ
घड़ी
ये
मगर
क्या
हो
गया
है
फिर
मुहब्बत
हो
गई
- nakul kumar
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कुछ
नहीं
है
ज़िंदगी
बर्बाद
है
अब
तो
मर
गया
हूँ
मैं
मुहब्बत
को
मनाने
में
nakul kumar
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छोड़
दो
बेघर
मुझे
सुनसान
सड़कों
पे
कहीं
दर्द
लेकर
इतने
सारे
किसके
दर
पे
जाऊँगा
मेरे
दिल
बीमार
को
ही
क़त्ल
भी
कर
दो
अभी
ऐसे
में
इस
हाल
में
तो
घर
नहीं
जा
पाऊँगा
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nakul kumar
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किरनों
से
घाइल
कर
देगा
चाँद
मुझे
पागल
कर
देगा
उसकी
बातें
सुनकर
देखो
बालू
से
बादल
कर
देगा
छूकर
देखेगा
हल्का
सा
पत्थर
में
कोंपल
कर
देगा
गीत
बुनेगा
ऐसे
ऐसे
बेड़ी
को
पायल
कर
देगा
ज़्यादा
भी
देखोगे
तो
फिर
आँखों
में
हलचल
कर
देगा
जाते
जाते
इस
बस्ती
को
बस्ती
से
जंगल
कर
देगा
इक
बारी
पलकें
मारी
तो
सारा
कुछ
ओझल
कर
देगा
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nakul kumar
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तन्हा
रहता
हूँ
अक्सर
ही
हर
एक
का
फिर
हो
जाता
हूँ
हो
जाता
हूँ
जैसे
दुनिया
फिर
ख़ुद
में
ही
खो
जाता
हूँ
चुपचाप
पड़ा
हूँ
कोने
में
ग़म
दर्द
जुदाई
साथ
लिए
जब
नींद
कभी
आ
जाए
तो
ख़्वाबों
को
बिछा
सो
जाता
हूँ
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nakul kumar
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मेरे
अंदर
से
आ
जाओ
बाहर
गहमा-गहमी
है
एक
बदन
में
दो
लोगों
को
कैसे
घर
ले
जाऊँगा
nakul kumar
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