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Nadeem Goyai
dhuaan sa koi hawaon men sarsaraaega kuchh
dhuaan sa koi hawaon men sarsaraaega kuchh | धुआँ सा कोई हवाओं में सरसराएगा कुछ
- Nadeem Goyai
धुआँ
सा
कोई
हवाओं
में
सरसराएगा
कुछ
फिर
इस
के
ब'अद
तुझे
भी
नज़र
न
आएगा
कुछ
मैं
जानता
हूँ
कहाँ
तक
है
दस्तरस
उस
की
जो
बीत
जाए
वही
सब
पे
आज़माएगा
कुछ
फ़सील-ए-संग
की
महदूदियत
हलाकत
है
उड़ा
दे
ख़ुद
को
हवा
में
तो
सनसनाएगा
कुछ
तू
पानियों
में
ज़रा
ऐसे
हाथ
पाँव
न
मार
निकलना
दूर
रहा
और
डूब
जाएगा
कुछ
- Nadeem Goyai
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नदी
आँखें
भँवर
ज़ुल्फ़ें
कहाँ
तैरूँ
कहाँ
डूबूँ
कि
तेरे
शहर
में
सब
की
अदाएँ
एक
जैसी
हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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वो
आँखें
आपके
ग़म
में
नहीं
हुई
हैं
नम
दिया
जलाते
हुए
हाथ
जल
गया
होगा
Shadab Javed
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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जब
बुलंदी
का
गुमाँ
था
तो
नहीं
याद
आई
अपनी
परवाज़
से
टूटे
तो
ज़मीं
याद
आई
वही
आँखें
कि
जो
ईमान-शिकन
आँखें
हैं
उन्हीं
आँखों
की
हमें
दावत-ए-दीं
याद
आई
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Subhan Asad
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घूमता
रहता
है
हर
वक़्त
मेरी
आँखों
में
एक
चेहरा
जो
कई
साल
से
देखा
भी
नहीं
Riyaz Tariq
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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तू
जो
हर
रोज़
नए
हुस्न
पे
मर
जाता
है
तू
बताएगा
मुझे
इश्क़
है
क्या
जाने
दे
Ali Zaryoun
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न
करो
बहस
हार
जाओगी
हुस्न
इतनी
बड़ी
दलील
नहीं
Jaun Elia
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तेरा
लिक्खा
जो
पढ़ूँ
तो
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तो
तेरा
चेहरा
देखूँ
Bhaskar Shukla
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न
जाने
कौन
सी
साअत
में
हो
गया
ग़ाएब
जो
अंदरून
टटोला
तो
लापता
ग़ाएब
किधर
को
जाऊँ
हवाओं
की
क़ैद
से
छुट
कर
ज़मीन
तंग
हुई
और
रास्ता
ग़ाएब
वो
एक
अब्र
की
मानिंद
मेरे
ऊपर
से
हवा
के
साथ
उड़ा
और
हो
गया
ग़ाएब
किसी
भी
तौर
बराबर
न
हो
सकी
तक़्सीम
जो
एक
सामने
आया
तो
दूसरा
ग़ाएब
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Nadeem Goyai
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मैं
अपने
साथ
कोई
ऐसी
चाल
चल
जाऊँ
हर
इक
हिसार
से
बचता
हुआ
निकल
जाऊँ
तमाम
सम्त
हवाओ
बिखेर
दो
मुझ
को
सिमटती
रेत
हूँ
दीवार
में
न
ढल
जाऊँ
कुछ
ऐसा
लोच
मिरे
दरमियान
पैदा
कर
हर
एक
चोट
पे
इक
गेंद
सा
उछल
जाऊँ
किसी
के
जिस्म
में
पैवस्त
हो
न
जाऊँ
कहीं
मैं
क्यूँँ
न
काँच
की
सब
किर्चियाँ
निगल
जाऊँ
तू
अपना
बोझ
उठा
मेरा
ए'तिबार
न
कर
न
जाने
बर्फ़
की
सतह
से
कब
फिसल
जाऊँ
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Nadeem Goyai
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