shaam-e-gham hai tiri yaadon ko saja rakha hai | शाम-ए-ग़म है तिरी यादों को सजा रक्खा है

  - Muzaffar Razmi
शाम-ए-ग़महैतिरीयादोंकोसजारक्खाहै
मैंनेदानिस्ताचराग़ोंकोबुझारक्खाहै
औरक्यादूँमैंगुलिस्ताँसेमोहब्बतकासुबूत
मैंनेकाँटोंकोभीपलकोंपेसजारक्खाहै
जानेक्यूँँबर्क़कोइससम्ततवज्जोहहीनहीं
मैंनेहरतरहनशेमनकोसजारक्खाहै
ज़िंदगीसाँसोंकातपताहुआसहराहीसही
मैंनेइसरेतपेइकक़स्रबनारक्खाहै
वोमिरेसामनेदुल्हनकीतरहबैठेहैं
ख़्वाबअच्छाहैमगरख़्वाबमेंक्यारक्खाहै
ख़ुदसुनाताहैउन्हेंमेरीमोहब्बतकेख़ुतूत
फिरभीक़ासिदनेमिरानामछुपारक्खाहै
कुछकुछतल्ख़ी-ए-हालातहैशामिल'रज़्मी'
तुमनेफूलोंसेभीदामनजोबचारक्खाहै
  - Muzaffar Razmi
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