अपनी हर बात ज़माने से छुपानी पड़ी थी

  - Mumtaz Gurmani
अपनीहरबातज़मानेसेछुपानीपड़ीथी
फिरभीजिसआँखमेंदेखातोकहानीपड़ीथी
मैंनेकुछरंगचुराएथेकिसीतितलीके
औरफिरउम्रहिफ़ाज़तमेंबितानीपड़ीथी
कलकिसीइश्क़केबीमारपेदमकरनाथा
पीर-ए-कामिलकोग़ज़लमेरीसुनानीपड़ीथी
कूचा-ए-इश्क़सेनाकामपलटनेवाले
तूनेदेखाथावहाँमेरीजवानीपड़ीथी
दिलसहपायाकिसीऔरसेक़ुर्बतउसकी
मुझकोदीवारसेतस्वीरहटानीपड़ीथी
मैंबहुतजल्दबुढ़ापेमेंचलाआयाथा
बिनतेरेउम्रकीरफ़्तारबढ़ानीपड़ीथी
उसकीहसरतकाबदनबर्फ़होजाएकहीं
अपनेसीनेमेंमुझेआगलगानीपड़ीथी
तेरे'मुमताज़'कोग़ममौतकाबसइसलिएहै
अपनेबालोंमेंतुझेख़ाकरवानीपड़ीथी
  - Mumtaz Gurmani
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