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Moin Hasan
khwaab saare rafta-rafta dil men dafn ho ga.e
khwaab saare rafta-rafta dil men dafn ho ga.e | ख़्वाब सारे रफ्ता-रफ्ता दिल में दफ़्न हो गए
- Moin Hasan
ख़्वाब
सारे
रफ्ता-रफ्ता
दिल
में
दफ़्न
हो
गए
तू
गया
तो
ख़्वाहिशों
ने
भी
कलाई
काट
दी
- Moin Hasan
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मत
बताना
कि
बिखर
जाएँ
तो
क्या
होता
है
नईं
नस्लों
को
नए
ख़्वाब
सजाने
देना
Ameer Imam
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गुज़र
रहा
हूँ
किसी
ख़्वाब
के
इलाक़े
से
ज़मीं
समेटे
हुए
आसमाँ
उठाए
हुए
Aziz Nabeel
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कभी
जो
ख़्वाब
था
वो
पा
लिया
है
मगर
जो
खो
गई
वो
चीज़
क्या
थी
Javed Akhtar
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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हम
उसे
आँखों
की
दहलीज़
न
चढ़ने
देते
नींद
आती
न
अगर
ख़्वाब
तुम्हारे
लेकर
एक
दिन
उसने
मुझे
पाक
नज़र
से
चूमा
उम्र
भर
चलना
पड़ा
मुझको
सहारे
लेकर
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Aalok Shrivastav
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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माना
कि
सब
के
सामने
मिलने
से
है
हिजाब
लेकिन
वो
ख़्वाब
में
भी
न
आएँ
तो
क्या
करें
Akhtar Shirani
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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मुझ
सेे
वहशत
बसर
नहीं
होती
ये
मुहब्बत
अगर
नहीं
होती
अब
हमारी
ख़बर
वो
देते
हैं
जिनको
अपनी
ख़बर
नहीं
होती
अश्क़-ए-नादां
कहाँ
कहाँ
फिरता
गर
तिरी
चश्म-ए-तर
नहीं
होती
बात
बस
मुख़्तसर
यही
हैं
कि
बात
भी
मुख़्तसर
नहीं
होती
गुफ़्तगू
करता
हूँ
तसव्वुर
में
बात
होती
हैं
पर
नहीं
होती
दश्त-ए-हिज्रा
में
रास्ता
कैसा.!
शाम-ए-गम
की
सहर
नहीं
होती
अब
मैं
सय्यद
को
आप
कहता
हूँ
अब
दु'आ
बे-असर
नहीं
होती
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Moin Hasan
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किसी
किसी
के
तो
शे'रों
में
बात
होती
हैं
किसी
किसी
का
तख़ल्लुस
से
काम
चलता
हैं
Moin Hasan
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देख
कर
नक़्श
ए
पा
मैं
चलता
हूँ
ये
जो
रस्ता
हैं
उनका
रस्ता
हैं
Moin Hasan
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कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
हूँ
मैं
अपने
आप
से
हारा
हुआ
हूँ
बड़ी
मुश्किल
से
भूला
हूँ
किसी
को
बड़ी
मुश्किल
से
तुम्हारा
हुआ
हूँ
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Moin Hasan
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इतना
जल्दी
न
रखो
यार
बदन
तय
कर
के
हमने
देखा
भी
नहीं
तुमको
अभी
जी
भर
के
इक
तो
वो
मोम
बदन
और
लताफ़त
से
चूर
हाथ
भी
उसको
लगाया
था
मैंने
डर
डर
के
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Moin Hasan
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