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Ankur Mishra
qaid mutthi men lage talwaar ho
qaid mutthi men lage talwaar ho | क़ैद मुठ्ठी में लगे तलवार हो
- Ankur Mishra
क़ैद
मुठ्ठी
में
लगे
तलवार
हो
कोई
ऐसा
साहिब-ए-असरार
हो
देख
जिसको
याद
आए
अपनी
पर
ज़िंदगी
उसकी
सनम
गुलज़ार
हो
छोड़
दूँगा
मैं
वो
रस्ता
भी
मगर
पहले
उसको
तो
किसी
से
प्यार
हो
माना
मैं
क़ाबिल
नहीं
उसके
मगर
दिल
ये
कैसे
मेरा
पर
तैयार
हो
मान
बैठा
हूँ
ख़ुदा
अपना
जिसे
कैसे
फिर
मंजूर
उसकी
हार
हो
भूल
जाए
वो
भले
मुझको
मगर
ऐ
ख़ुदा
तन्हा
न
मेरा
यार
हो
- Ankur Mishra
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रहगुज़र
रहनुमा
या
ख़ुदा
है
क्या
कहूँ
तुम
सेे
वो
मेरा
क्या
है
शाम
ढलते
उठा
लेते
हैं
मय
जाने
वो
इश्क़
है
या
नशा
है
एक
अरसे
से
गुम
हूँ
कहीं
पर
रस्ता
हर
एक
मुझको
पता
है
माना
अब
साथ
मेरे
नहीं
वो
बहकी
बहकी
ये
फिर
क्यूँ
हवा
है
भूल
जाता
मैं
भी
उसको
लेकिन
ये
मोहब्बत
भी
'अंकुर'
नशा
है
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आँखों
में
तुम
ये
ख़ुमारी
रहने
देते
याद
थोड़ी
तो
हमारी
रहने
देते
बरसों
से
हूँ
प्यासा
इन
नज़रों
का
मैं
भी
हम
पे
ये
आँखें
तुम्हारी
रहने
देते
मुद्दतों
के
बाद
आया
है
ये
लम्हा
रात
तो
ये
अब
हमारी
रहने
देते
जाने
फिर
कब
हो
दुबारा
मिलना
अंकुर
नज़रों
में
ऑंखें
तुम्हारी
रहने
देते
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हम
भी
पढ़ते
पर
मोहब्बत
में
हर्फ़
दिखते
हैं
कहाँ
ख़त
में
आइने
की
सम्त
बैठा
है
आइना
इक
तेरी
सूरत
में
बा-वफ़ा
होकर
भी
अंकुर
ने
है
गुज़ारी
बस
जहालत
में
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किस
तरह
ख़ुद
से
वफ़ा
करते
हम
अगर
तुझ
सेे
दग़ा
करते
सम्त
तेरी
हैं
निगाहें
सब
किस
तरफ़
ये
आइना
करते
रूठ
जाती
ये
फ़ज़ा
हम
सेे
जो
परिंदों
से
गिला
करते
है
तक़ाज़ा
उम्र
का
वर्ना
इश्क़
तो
बे-इंतिहा
करते
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दे
रहा
था
सभी
को
दिलासा
सर
उठाए
मैं
अपना
जनाज़ा
किस
तरह
आज़माऊँ
उसे
फिर
ख़्वाब
है
जो
मिरी
ख़्वाहिशों
का
बे-सबब
बे-वजह
पूछते
हो
आइने
से
पता
आदमी
का
रात
भर
तिश्नगी
में
किसी
की
यार
जलता
रहा
जुगनुओं
सा
एक
मुद्दत
हुई
जागते
अब
चाँद
तारों
की
सफ़
ज़िंदगी
आ
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