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Ankur Mishra
phool se naazuk badan ko
phool se naazuk badan ko | फूल से नाज़ुक बदन को
- Ankur Mishra
फूल
से
नाज़ुक
बदन
को
छोड़
दो
बहती
पवन
को
रंग
पड़
जाएगा
फ़ीका
मत
छुओ
बाग़-ए-अदन
को
साथ
है
जो
बन
के
साया
जी
लो
उस
दर्द-ए-सुख़न
को
इक
नज़र
ही
काफ़ी
है
बस
छू
सको
जो
मन
से
मन
को
खो
गया
था
ख़ुद
में
'अंकुर'
ढूँढते
रश्क-ए-चमन
को
- Ankur Mishra
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कितनी
उल्फ़त
थी
कितनी
वफ़ा
है
अब
भी
तेरा
वही
रास्ता
है
ढूँढता
है
किसे
दर-ब-दर
तू
कैसा
ये
दर्द
कैसी
दवा
है
उम्र
भर
मैं
रहा
साथ
जिसके
साया
वो
अब
कहीं
लापता
है
है
यक़ीं
अब
भी
मुझपे
उसे
पर
शख़्स
वो
यार
पागल
बड़ा
है
लौटा
है
जब
से
वो
उस
गली
से
जान
देने
पे
'अंकुर'
अड़ा
है
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उस
से
अब
मिलना
होता
नहीं
क्यूँ
तो
पर
अब
मैं
रोता
नहीं
खाए
हैं
ज़ख़्म
इतने
कि
अब
दर्द
से
दर्द
होता
नहीं
शब
इक
आया
था
वो
ख़्वाब
में
रात
से
उस
मैं
सोता
नहीं
आख़िरी
इश्क़
था
वा
मेरा
कुछ
भी
तब
से
मैं
खोता
नहीं
है
वो
मौजूद
हर
क़तरे
में
मैं
तभी
आँख
धोता
नहीं
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आँखों
से
बहकर
निकला
है
चेहरा
वो
थोड़ा
धुॅंधला
है
मैं
छोड़
तो
दूँ
जीना
पर
ख़ुद
को
अभी
तो
बदला
है
हूँ
ठीक
मैं
जैसा
भी
हूँ
ये
ज़ख़्म
कोई
पिछला
है
हैराॅं
हो
क्यूँँ
यूँँ
देख
कर
जब
रंग
हमने
बदला
है
इक
उम्र
लगती
है
बशर
मरहम
तो
बस
इक
जुम्ला
है
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अपनी
भी
अब
इक
कहानी
चाहिए
फिर
वही
मुझको
जवानी
चाहिए
पास
सब
कुछ
है
मिरी
मुझको
मगर
उसकी
कोई
इक
निशानी
चाहिए
रंग
ख़ुद
भर
दूँगा
मैं
पहले
मगर
रात
दीवानी
वो
आनी
चाहिए
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एक
ही
ज़ख़्म
हर
शाख़
में
है
आग
कितनी
मिरी
ताख़
में
है
बंद
रखता
हूँ
खिड़की
मैं
लेकिन
मसअला
कोई
सूराख़
में
है
ज़िंदगी
को
तलब
मौत
की
थी
वर्ना
जुर्रत
भी
गुस्ताख़
में
है
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