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Ankur Mishra
khwahishon kii sehar dekhte hain
khwahishon kii sehar dekhte hain | ख़्वाहिशों की सहर देखते हैं
- Ankur Mishra
ख़्वाहिशों
की
सहर
देखते
हैं
हम
कहीं
भी
अगर
देखते
हैं
लोग
वाक़िफ
नहीं
तिश्नगी
से
और
उसकी
नज़र
देखते
हैं
इस
क़दर
ख़ौफ़
है
ज़िंदगी
का
मौत
को
सर-ब-सर
देखते
हैं
- Ankur Mishra
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मार
कर
ख़ुद
को
मैं
ज़िंदा
हूँ
लगता
है
जैसे
दरिंदा
हूँ
फ़ासला
मुझ
सेे
रखो
सारे
एक
प्यासा
मैं
कुशिंदा
हूँ
बरसों
भटका
हूँ
यहाँ
पर
मैं
आज
भी
ख़ुद
में
चुनिंदा
हूँ
पहलू
में
उसके
था
सब
लेकिन
मैं
ही
आवारा
परिंदा
हूँ
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ख़ामोश
लफ़्ज़ों
को
इशारा
चाहिए
दरिया
को
सहरा
का
सहारा
चाहिए
यूँँ
कब
तलक
बैठे
रहेंगे
बेसबब
हम
साहिलों
को
भी
किनारा
चाहिए
उल्फ़त
वफ़ा
सब
है
मिरे
पहलू
में
बस
मुझको
इशारा
इक
तुम्हारा
चाहिए
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अब
कहीं
से
तो
शुरू
ये
सिलसिला
हो
इन
लबों
का
उन
लबों
से
राब्ता
हो
ख़्वाब
टूटे
हैं
कई
सपने
सजाते
बावफ़ा
कैसे
कोई
फिर
आइना
हो
एतिबार-ए-ग़म
मुझे
पहले
से
था
पर
काश
हो
ये
आख़िरी
अंकुर
सदा
हो
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Ankur Mishra
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इक
ज़माने
से
सफ़र
में
हूँ
मैं
अकेला
रहगुज़र
में
हूँ
दोस्त
बन
कर
आया
था
वो
घर
क़ैद
मैं
जिसकी
नज़र
में
हूँ
हाल
मत
पूछो
अभी
मेरा
बरसों
से
ख़्वाब-ए-सहर
में
हूँ
इश्क़
है
उसकी
ज़बाँ
लेकिन
मैं
मोहब्बत
के
असर
में
हूँ
खो
दिया
जाने
कहाँ
मैंने
वो
पता
मैं
जिसके
घर
में
हूँ
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Ankur Mishra
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काटने
को
शब-ए-हिज्र
तैयार
हो
काश
कोई
ग़म-ए-दिल
ख़रीदार
हो
लिख
सकूँ
नाम
जिसका
कलाई
पे
मैं
काश
ऐसा
कोई
इक
अदाकार
हो
मय-कशी
छोड़
देंगे
सनम
हम
अगर
कोई
हम
सा
हमारा
तलबगार
हो
शख़्स
भाता
नहीं
वो
मुझे
भी
कभी
जो
ज़बाँ
और
आँखों
से
अख़बार
हो
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