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Ankur Mishra
ik zamaane se safar men hooñ
ik zamaane se safar men hooñ | इक ज़माने से सफ़र में हूँ
- Ankur Mishra
इक
ज़माने
से
सफ़र
में
हूँ
मैं
अकेला
रहगुज़र
में
हूँ
दोस्त
बन
कर
आया
था
वो
घर
क़ैद
मैं
जिसकी
नज़र
में
हूँ
हाल
मत
पूछो
अभी
मेरा
बरसों
से
ख़्वाब-ए-सहर
में
हूँ
इश्क़
है
उसकी
ज़बाँ
लेकिन
मैं
मोहब्बत
के
असर
में
हूँ
खो
दिया
जाने
कहाँ
मैंने
वो
पता
मैं
जिसके
घर
में
हूँ
- Ankur Mishra
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कर
के
उसको
हम
इशारा
देखते
हैं
हाॅं
मुसलसल
ये
नज़ारा
देखते
हैं
सम्त
बैठी
है
सॅंवर
के
ज़िंदगी
पर
जा-ब-जा
हम
वो
सितारा
देखते
हैं
इस
क़दर
है
ख़ौफ़
दरिया
का
कि
अंकुर
लोग
साहिल
से
किनारा
देखते
हैं
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जलना
ही
अपना
मुक़द्दर
है
कोरा
काग़ज़
धुँधला
अक्षर
है
हो
यक़ीं
कैसे
किसी
पे
अब
चंद
वादें
और
बिस्तर
है
क्या
लिखूँ
मैं
इस
सेे
आगे
अब
जेब
ख़ाली
जिस्म
बंजर
है
मुद्दतों
पूछा
नहीं
उसने
गहरा
कितना
ये
समुंदर
है
डूबना
तय
था
मिरा
अंकुर
एक
सहरा
मेरे
अंदर
है
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थक
गया
हूँ
अब
सहारा
चाहिए
मेरे
अश्कों
को
किनारा
चाहिए
जानता
हूँ
नाम
मैं
उसका
मगर
उसका
कोई
इक
इशारा
चाहिए
बीत
जाए
उम्र
फिर
सारी
मगर
मुझको
वो
सारे
का
सारा
चाहिए
एक
मुद्दत
से
हूँ
बेघर
पर
हमें
अब
पता
हमको
हमारा
चाहिए
कब
कहा
है
इश्क़
है
उस
सेे
मगर
फिर
वही
मुझको
दुबारा
चाहिए
माना
'अंकुर'
दूर
है
मुझ
सेे
मगर
आइने
में
वो
सितारा
चाहिए
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बर्फ़
पलकों
पे
जो
ये
जमी
रह
गई
देर
तक
कोई
खिड़की
खुली
रह
गई
भूल
जाता
हूँ
हर
शाम
मैं
ख़ुद
को
ही
दूर
मुझ
सेे
कहीं
रौशनी
रह
गई
हार
कर
लौट
आया
हूँ
अपना
मैं
सब
मुठ्ठी
में
बस
ये
इक
ज़िंदगी
रह
गई
ज़ख़्म
खाकर
भी
इतने
ख़ुदा
जाने
क्यूँ
होंठों
पे
मेरे
कैसे
हँसी
रह
गई
अब
सुनाऊँ
किसे
क़िस्सा
बर्बादी
का
वो
नज़र
जो
झुकी
थी
झुकी
रह
गई
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हाल-ए-दिल
कह
नहीं
सकते
साथ
तेरे
बह
नहीं
सकते
छोड़
दी
है
मय-कशी
हमने
तन्हा
हम
अब
रह
नहीं
सकते
बरसों
देखा
रस्ता
तेरा
पर
और
ज़िल्लत
सह
नहीं
सकते
कर
लिया
है
इश्क़
ख़ुद
से
अब
दूर
घर
से
रह
नहीं
सकते
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