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Ankur Mishra
khwahishon ke toote ghar men rahte hain
khwahishon ke toote ghar men rahte hain | ख़्वाहिशों के टूटे घर में रहते हैं
- Ankur Mishra
ख़्वाहिशों
के
टूटे
घर
में
रहते
हैं
ख़्वाब
जितने
भी
नज़र
में
रहते
हैं
बाँध
लेती
हैं
हवाएँ
भी
जिसे
उस
सदाओं
की
सहर
में
रहते
हैं
टिमटिमाते
यार
ये
जुगनू
भी
उन
चाँद
तारों
के
असर
में
रहते
हैं
इक
मुकम्मल
दास्ताँ
होती
नहीं
सैकड़ों
'अंकुर'
अधर
में
रहते
हैं
- Ankur Mishra
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दर्द
से
लबरेज़
रहने
दो
अश्क
ये
आँखों
से
बहने
दो
फिर
नहीं
होनी
मोहब्बत
ये
लाश
अरमानों
की
दहने
दो
कब
से
चुप
हैं
आँखें
दोनों
ये
कुछ
इन्हें
भी
अब
तो
कहने
दो
जाने
मिलना
हो
न
दोबारा
अब
तो
ये
दीवार
ढ़हने
दो
चाहा
वा'दा
कब
कोई
यारा
दर्द
मुझको
तुम
ये
सहने
दो
मत
करो
इतनी
मोहब्बत
तुम
मुझको
अब
बेज़ार
रहने
दो
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हाल-ए-दिल
कह
नहीं
सकते
साथ
तेरे
बह
नहीं
सकते
छोड़
दी
है
मय-कशी
हमने
तन्हा
हम
अब
रह
नहीं
सकते
बरसों
देखा
रस्ता
तेरा
पर
और
ज़िल्लत
सह
नहीं
सकते
कर
लिया
है
इश्क़
ख़ुद
से
अब
दूर
घर
से
रह
नहीं
सकते
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जो
लबों
से
कहा
नहीं
करते
क्या
किसी
के
हुआ
नहीं
करते
बेच
कर
नींद
लाए
हैं
सपने
ख़ुद
से
उसको
जुदा
नहीं
करते
काट
कर
हाथ
लिख
लिया
लेकिन
ख़त
किसी
को
दिया
नहीं
करते
मेरी
शाखों
पे
लिखता
है
वो
पर
ख़ुशबू
उसकी
लिया
नहीं
करते
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मोहब्बत
और
वो
भी
बे-अदब
हो
कोई
ऐसा
नहीं
जिसकी
तलब
हो
अँधेरा
है
बहुत
माना
अभी
पर
ज़रूरी
तो
नहीं
क़ातिल
ये
शब
हो
करें
आख़िर
तमन्ना
कोई
क्यूँ
हम
ये
दिल
बेचैन
आख़िर
क्यूँ
अहब
हो
नज़र
सब
कर
रही
है
जब
बयाँ
अब
लबों
से
शोर
क्यूँ
फिर
बे-सबब
हो
नहीं
अपना
कोई
'अंकुर'
मगर
इक
मुकम्मल
ख़्वाब
ही
जाना
वो
अब
हो
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रखते
क्यूँ
राब्ता
बाग़बाँ
से
लोग
वाक़िफ़
थे
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
से
सूख
जाते
हैं
शाख़ों
पे
पत्ते
टूट
जाते
हैं
कार-ए-जहाँ
से
इसलिए
जान
देनी
पड़ी
फिर
जान
जाए
न
अस्र-ए-रवाँ
से
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