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Ankur Mishra
KHud men KHud ko dhoondhta hooñ
KHud men KHud ko dhoondhta hooñ | ख़ुद में ख़ुद को ढूँढता हूँ
- Ankur Mishra
ख़ुद
में
ख़ुद
को
ढूँढता
हूँ
तन्हा
इतना
हो
गया
हूँ
पास
इक
क़तरा
नहीं
पर
जाम
मय
से
भर
चुका
हूँ
मुझको
पागल
कहने
वाले
मैं
कहाँ
तुझ
सेे
जुदा
हूँ
- Ankur Mishra
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इक
मुझे
मैं
ही
मिलता
नहीं
पास
वर्ना
मिरे
क्या
नहीं
क़ैद
चाहूँ
तो
कर
लूँ
मगर
अब
परिंदा
वो
उड़ता
नहीं
रंग
इतने
हैं
इन
आँखों
में
ख़्वाब
कोई
ठहरता
नहीं
मैं
छुड़ा
तो
लूँ
दामन
मगर
हाथ
कोई
पकड़ता
नहीं
इश्क़
उस
सेे
हुआ
है
मुझे
जो
किसी
का
भी
होता
नहीं
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फिर
वही
इल्ज़ाम
आया
है
फिर
कोई
पैग़ाम
लाया
है
हम
तो
भूले
बैठे
थे
उनको
फिर
हमें
किसने
रुलाया
है
मैं
कहाँ
से
लाऊँ
वो
रातें
ये
मुझे
किसने
बुलाया
है
मैं
तो
कब
का
मर
चुका
था
फिर
ये
मुझे
किसने
जगाया
है
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इन
गुलों
की
तरह
महफ़िलों
से
हम
निकाले
गए
थे
दिलों
से
इश्क़
दरिया
से
उनको
भी
है
जो
मिल
न
पाए
कभी
साहिलों
से
काट
लेते
हैं
अपनी
कलाई
ख़ौफ़
आता
है
इन
बुज़दिलों
से
काम
मुश्किल
है
'अंकुर'
मोहब्बत
करते
रहना
तिरे
क़ातिलों
से
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हर
शब
उसी
दर
पे
ठहर
जाते
हैं
हम
देते
हुए
रस्ता
गुज़र
जाते
हैं
हम
है
रब्त
हमको
इन
चराग़ों
से
मगर
बस
ज़िंदगी
की
लौ
से
डर
जाते
हैं
हम
आसाँ
नहीं
माना
मगर
ऐ
ज़िंदगी
कर
के
जमा
ख़ुद
को
बिख़र
जाते
हैं
हम
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उसके
लब-ओ-रुख़्सार
से
था
इश्क़
मुझको
प्यार
से
वो
माने
चाहे
अब
न
पर
ख़ुश
हूँ
मैं
अपनी
हार
से
इक
उम्र
तन्हा
गुज़री
है
लड़ते
दर-ओ-दीवार
से
कैसे
कहूँ
उल्फ़त
नहीं
उस
बे-वफ़ा
बेज़ार
से
रो
रो
के
आँखें
कहती
हैं
जल
जाऊँ
इस
अंगार
से
मिलना
नहीं
कुछ
भी
बशर
ख़ाली
पड़े
बाज़ार
से
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