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Ankur Mishra
KHaamushi honthon pe dikhti hai
KHaamushi honthon pe dikhti hai | ख़ामुशी होंठों पे दिखती है
- Ankur Mishra
ख़ामुशी
होंठों
पे
दिखती
है
जो
था
जैसा
था
अभी
भी
है
काट
ली
वैसे
तो
हमने
भी
नींद
पर
आँखों
में
चुभती
है
हर
दफ़ा
हारा
हूँ
बाज़ी
मैं
हर
दफ़ा
वो
लौट
आती
है
इक
तमन्ना
है
अधूरी
सी
एक
ख़्वाहिश
जीत
जाती
है
देखता
हूँ
जब
भी
उसको
मैं
याद
मुझको
मेरी
आती
है
- Ankur Mishra
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इक
धड़कते
दिल
को
पत्थर
कर
गया
ज़ख़्म
इतने
मेरे
अंदर
कर
गया
साफ़
कुछ
भी
अब
नज़र
आता
नहीं
ख़ुश्क
आँखों
को
समुंदर
कर
गया
डर
रहा
था
मैं
जिसे
छूने
से
भी
जाने
घर
कब
मेरे
अंदर
कर
गया
आख़िरी
है
इश्क़
मेरा
इस
दफ़ा
बोलकर
ख़ाली
समुंदर
कर
गया
दोस्त
बन
कर
साथ
था
दुश्मन
मिरे
नाम
जिसके
मैं
मुक़द्दर
कर
गया
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जो
था
जितना
था
सारा
गया
बेसबब
ही
मैं
मारा
गया
छू
लिया
था
उसे
इसलिए
मैं
फ़लक
से
उतारा
गया
ज़िंदगी
क्यूँ
न
तुझ
सेे
कभी
नाम
मेरा
पुकारा
गया
सब्र
क़ायम
था
मेरा
मगर
सब्र
से
सब्र
हारा
गया
फिर
उसी
दर
पे
जाकर
बशर
बोझ
सारा
उतारा
गया
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Ankur Mishra
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देख
हँसता
मुझे
ज़िंदगी
पर
रो
पड़ा
आइना
बेबसी
पर
साथ
रहता
था
मेरे
कभी
वो
पास
उसके
है
ग़म
वो
अभी
पर
दोस्त
दुश्मन
सभी
याद
आए
याद
आया
न
मुझको
मैं
ही
पर
जान
लेती
नहीं
मौत
भी
अब
है
यक़ीं
इस
क़दर
ज़िंदगी
पर
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बे-ख़बर
मेरी
तलब
से
है
प्यास
जिस
की
दिल
को
कब
से
है
इन
लकीरों
में
नहीं
शामिल
नाम
होंठों
पे
जो
कब
से
है
एक
मुझ
से
ही
नहीं
वर्ना
राब्ता
'अंकुर'
का
सब
से
है
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ख़ुद
से
जो
हम
बेख़बर
रहने
लगे
थे
अश्क
इन
आँखों
से
फिर
बहने
लगे
थे
करते
क्या
शिकवा
किसी
से
हम
यहाँ
अब
तंज़
सारे
हम
ही
जब
सहने
लगे
थे
बाद
बरसों
के
तो
आया
था
ये
लम्हा
बाद
बरसों
के
वो
कुछ
कहने
लगे
थे
ख़्वाह
मख़ाह
ही
छोड़
आया
शहर
वो
मैं
यार
अब
तो
दिल
में
वो
रहने
लगे
थे
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Ankur Mishra
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