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Ankur Mishra
Ghar me divar pe gungunate hue
घर में दीवार पे गुनगुनाते हुए
- Ankur Mishra
घर
में
दीवार
पे
गुनगुनाते
हुए
एक
तस्वीर
थी
मुस्कुराते
हुए
जिस
तरह
ले
रही
है
मिरा
इम्तिहाॅं
नाम
डरता
हूॅं
उसका
बताते
हुए
एक
अर्सा
हुआ
इस
तरह
हम-नशीं
उन
लबों
से
निशाॅं
ये
मिटाते
हुए
शाम
बढ़ती
थी
आँखों
में
मेरे
कभी
ज़िंदगी
के
बशर
गीत
गाते
हुए
- Ankur Mishra
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कैसी
है
ज़िंदगी
पूछते
हो
मुझ
सेे
मेरी
ख़ुशी
पूछते
हो
छोड़
आया
जो
मैं
पास
उसके
क्यूँ
वो
तुम
अब
हँसी
पूछते
हो
जान
कर
दी
जुदा
जिस्म
से
पर
यार
तुम
ख़ुद-कुशी
पूछते
हो
बरसों
देखा
नहीं
चेहरा
ख़ुद
का
और
तुम
आशिक़ी
पूछते
हो
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Ankur Mishra
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हद
से
हम
अब
गुजर
थोड़ी
जाते
मियाँ
जो
कहा
हम
वो
कर
थोड़ी
जाते
मियाँ
है
मोहब्बत
बहुत
माना
तुझ
सेे
मगर
तेरे
बिन
हम
भी
मर
थोड़ी
जाते
मियाँ
ये
जो
रखते
हो
ख़ंजर
निगाहों
में
तुम
इनसे
हम
कोई
डर
थोड़ी
जाते
मियाँ
पहले
रिश्ते
रक़ीबों
से
तो
तोड़ते
लौट
फिर
हम
भी
घर
थोड़ी
जाते
मियाँ
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Ankur Mishra
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इक
दफ़ा
भी
हम
ख़ुशी
से
मिल
न
पाए
ज़िंदगी
से
लौटते
हैं
रोज़
तन्हा
अश्क
यादों
की
गली
से
राब्तों
के
इस
सफ़र
में
दूर
हैं
कितने
सभी
से
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Ankur Mishra
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कोई
रहता
नहीं
फिर
भी
भरा
सा
ही
है
लगता
सच
तेरी
यादों
से
घर
अब
भी
हरा
सा
ही
है
लगता
सच
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Ankur Mishra
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उम्र
भर
रोती
रहेंगी
आँखें
ये
सोती
रहेंगी
मर
भी
जाऊँ
मैं
अगर
जो
ख़्वाब
ये
बोती
रहेंगी
मैंने
चाहा
है
उसे
जब
बातें
तो
होती
रहेंगी
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Ankur Mishra
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