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Ankur Mishra
Farz apna kabhi to nibha zindgi
फ़र्ज़ अपना कभी तो निभा ज़िंदगी
- Ankur Mishra
फ़र्ज़
अपना
कभी
तो
निभा
ज़िंदगी
हँस
पडूॅं
इस
तरह
मुस्कुरा
ज़िंदगी
प्यास
बढ़ने
लगी
है
तुझे
देखकर
मायने
ज़िंदगी
के
बता
ज़िंदगी
चंद
क़तरे
ही
दामन
में
आए
मिरे
ज़ोर
से
शाख़
अपनी
हिला
ज़िंदगी
जल
रहे
हैं
चराग़ों
से
जलते
दिए
कर
रही
है
इशारा
हवा
ज़िंदगी
हो
न
जाए
कहीं
ख़ाक
अंकुर
भी
अब
फ़ासला
राब्तों
से
बढ़ा
ज़िंदगी
- Ankur Mishra
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दर्द
को
दिल
के
सहारे
छोड़
जाता
है
दरमियाॅं
ख़ुद
को
हमारे
छोड़
जाता
है
हू-ब-हू
है
शख़्सियत
उस
सी
हमारी
जो
तख़्तियों
पे
रंग
सारे
छोड़
जाता
है
सोचते
हैं
देखकर
हर
शब
यही
अक्सर
कौन
रिंदों
को
किनारे
छोड़
जाता
है
आसमाॅं
से
नाप
लेता
हैं
ज़मीं
अपनी
गर्द
में
अंकुर
सितारे
छोड़
जाता
है
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घर
से
मंज़िल
का
पता
लेकर
उड़
गए
सब
घोंसला
लेकर
अक्श
आँखों
में
है
ज़िंदा
इक
टूटे
ख़्वाबों
की
सदा
लेकर
बेसबब
फिरते
हैं
दोनों
ही
इक
तमन्ना
जा-ब-जा
लेकर
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किस
तरह
ख़ुद
से
वफ़ा
करते
हम
अगर
तुझ
सेे
दग़ा
करते
सम्त
तेरी
हैं
निगाहें
सब
किस
तरफ़
ये
आइना
करते
रूठ
जाती
ये
फ़ज़ा
हम
सेे
जो
परिंदों
से
गिला
करते
है
तक़ाज़ा
उम्र
का
वर्ना
इश्क़
तो
बे-इंतिहा
करते
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किस
ख़ता
की
क्या
सजा
दें
अब
किसे
हम
क्या
दु'आ
दें
ज़िंदा
हैं
जब
हम
में
हम
फिर
कैसे
अब
ख़ुद
को
भुला
दें
हो
चुकी
है
राख
जो
अब
आग
फिर
क्यूँ
वो
जला
दें
गिरने
से
पहले
ही
घर
के
शम्अ
हम
कैसे
बुझा
दें
माना
मुश्किल
है
मगर
हम
क्यूँ
न
ख़ुद
को
ही
मिटा
दें
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बाग़बाँ
और
बू-ए-चमन
का
राब्ता
है
बदन
से
कफ़न
का
तिश्नगी
प्यास
बनने
लगी
है
छू
रहा
है
कोई
ज़ख़्म
मन
का
दे
रही
हैं
सदाएँ
सदा
अब
हैं
हवाएँ
किनारा
बदन
का
किसलिए
कोई
वा'दा
करूँँ
मैं
है
मुझे
ख़ौफ़
रश्क-ए-चमन
का
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