rukh-e-nigaar se hai soz-e-jaavedaani-e-sham'a | रुख़-ए-निगार से है सोज़-ए-जावेदानी-ए-शमअ'

  - Mirza Ghalib
रुख़-ए-निगारसेहैसोज़-ए-जावेदानी-ए-शमअ'
हुईहैआतिश-ए-गुलआब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-शमअ'
ज़बान-ए-अहल-ए-ज़बाँमेंहैमर्ग-ए-ख़ामोशी
येबातबज़्ममेंरौशनहुईज़बानी-ए-शमअ'
करेहैसर्फ़ब-ईमा-ए-शो'लाक़िस्सातमाम
ब-तर्ज़-ए-अहल-ए-फ़नाहैफ़साना-ख़्वानी-ए-शमअ'
ग़मउसकोहसरत-ए-परवानाकाहैशो'ले
तिरेलरज़नेसेज़ाहिरहैना-तवानी-ए-शमअ'
तिरेख़यालसेरूहएहतिज़ाज़करतीहै
ब-जल्वा-रेज़ी-ए-बाद-ओ-ब-पर-फ़िशानी-ए-शमअ'
नशात-ए-दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़कीबहारपूछ
शगुफ़्तगीहैशहीद-ए-गुल-ए-खिज़ानी-ए-शमअ'
जलेहैदेखकेबालीन-ए-यारपरमुझको
क्यूँँहोदिलपेमिरेदाग़-ए-बद-गुमानी-ए-शमअ'
  - Mirza Ghalib
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