manzoor thii ye shakl tajalli ko noor ki | मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की

  - Mirza Ghalib
मंज़ूरथीयेशक्लतजल्लीकोनूरकी
क़िस्मतखुलीतिरेक़द-ओ-रुख़सेज़ुहूरकी
इकख़ूँ-चकाँकफ़नमेंकरोड़ोंबनाओहैं
पड़तीहैआँखतेरेशहीदोंपेहूरकी
वाइ'ज़तुमपियोकिसीकोपिलासको
क्याबातहैतुम्हारीशराब-ए-तहूरकी
लड़ताहैमुझसेहश्रमेंक़ातिलकिक्यूँँउठा
गोयाअभीसुनीनहींआवाज़सूरकी
आमदबहारकीहैजोबुलबुलहैनग़्मा-संज
उड़तीसीइकख़बरहैज़बानीतुयूरकी
गोवाँनहींवाँकेनिकालेहुएतोहैं
का'बेसेइनबुतोंकोभीनिस्बतहैदूरकी
क्याफ़र्ज़हैकिसबकोमिलेएकसाजवाब
आओहमभीसैरकरेंकोह-ए-तूरकी
गर्मीसहीकलाममेंलेकिनइसक़दर
कीजिससेबातउसनेशिकायतज़रूरकी
'ग़ालिब'गरइससफ़रमेंमुझेसाथलेचलें
हजकासवाबनज़्रकरूँँगाहुज़ूरकी
  - Mirza Ghalib
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