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Meraj Faizabadi
kisi ki marzi ko apni qismat banaa chuke hain
kisi ki marzi ko apni qismat banaa chuke hain | किसी की मर्ज़ी को अपनी क़िस्मत बना चुके हैं
- Meraj Faizabadi
किसी
की
मर्ज़ी
को
अपनी
क़िस्मत
बना
चुके
हैं
हम
अपने
हाथों
की
सब
लकीरें
मिटा
चुके
हैं
चलो
समुंदर
की
वुसअतों
में
सुकून
ढूँढे
कि
साहिलों
पर
बहुत
घरौंदें
बना
चुके
हैं
उन्हीं
छतों
से
हमारे
आँगन
में
मौत
बरसी
वही
छतें
जिन
से
हम
पतंगें
उड़ा
चुके
हैं
- Meraj Faizabadi
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मुझे
भी
अपनी
क़िस्मत
पर
हमेशा
नाज़
रहता
है
सुना
है
ख़्वाहिशें
उनकी
भी
शर्मिंदा
नहीं
रहती
सुना
है
वो
भी
अब
तक
खाए
बैठी
हैं
कई
शौहर
बहुत
दिन
तक
मेरी
भी
बीवियाँ
ज़िंदा
नहीं
रहती
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Paplu Lucknawi
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जो
मिल
गया
उसी
को
मुक़द्दर
समझ
लिया
जो
खो
गया
मैं
उस
को
भुलाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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ख़्वाहिश
सब
रखते
हैं
तुझको
पाने
की
और
फिर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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उन
के
होने
से
बख़्त
होते
हैं
बाप
घर
के
दरख़्त
होते
हैं
Unknown
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गर
डूबना
ही
अपना
मुक़द्दर
है
तो
सुनो
डूबेंगे
हम
ज़रूर
मगर
नाख़ुदा
के
साथ
Kaifi Azmi
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इसी
होनी
को
तो
क़िस्मत
का
लिखा
कहते
हैं
जीतने
का
जहाँ
मौक़ा
था
वहीं
मात
हुई
Manzar Bhopali
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कोई
भी
रोक
न
पाता,
गुज़र
गया
होता
मेरा
नसीब-ए-मोहब्बत
सँवर
गया
होता
न
आईं
होती
जो
बेग़म
मेरी
अयादत
को
मैं
अस्पताल
की
नर्सों
पर
मर
गया
होता
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Paplu Lucknawi
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गर
ये
अच्छी
क़िस्मत
है
तो
लानत
ऐसी
क़िस्मत
पर
अपने
फोन
में
देख
रहे
हैं,
बाप
को
बूढ़ा
होते
हम
Siddharth Saaz
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किसी
को
साल-ए-नौ
की
क्या
मुबारकबाद
दी
जाए
कैलन्डर
के
बदलने
से
मुक़द्दर
कब
बदलता
है
Aitbar Sajid
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मिलने
की
तरह
मुझ
सेे
वो
पल
भर
नहीं
मिलता
दिल
उस
से
मिला
जिस
सेे
मुक़द्दर
नहीं
मिलता
Naseer Turabi
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और
चुप
रहने
पे
तैयार
नहीं
हैं
हम
लोग
आदमी
हैं
दर-ओ-दीवार
नहीं
हैं
हम
लोग
धूप
और
छाँव
का
जादू
न
चलाओ
हम
पर
चढ़ते
सूरज
के
परस्तार
नहीं
हैं
हम
लोग
हम
से
ज़िंदा
है
ज़माने
में
तमद्दुन
का
निज़ाम
मुर्दा
तहज़ीबों
के
आसार
नहीं
हैं
हम
लोग
जिन
को
किरदार
का
मफ़्हूम
बताया
हम
ने
वो
कहें
साहब-ए-किरदार
नहीं
हैं
हम
लोग
जाओ
तारीख़
के
औराक़
पलटकर
देखो
फिर
ये
कहना
कि
वफ़ादार
नहीं
हैं
हम
लोग
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Meraj Faizabadi
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मुझ
को
सूली
पे
चढ़ाकर
भी
दुखी
है
दुनिया
वो
मेरी
मौत
नहीं
आँखों
में
डर
माँगती
है
Meraj Faizabadi
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जब
तुझे
रिश्ते
निभाने
का
हुनर
आ
जाएगा
तेरा
दुश्मन
ख़ुद
ही
चलकर
तेरे
घर
आ
जाएगा
Meraj Faizabadi
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ज़िंदगी
दी
है
तो
जीने
का
हुनर
भी
देना
पाँव
बख़्शें
हैं
तो
तौफ़ीक़-ए-सफ़र
भी
देना
गुफ़्तुगू
तू
ने
सिखाई
है
कि
मैं
गूँगा
था
अब
मैं
बोलूँगा
तो
बातों
में
असर
भी
देना
मैं
तो
इस
ख़ाना-बदोशी
में
भी
ख़ुश
हूँ
लेकिन
अगली
नस्लें
तो
न
भटकें
उन्हें
घर
भी
देना
ज़ुल्म
और
सब्र
का
ये
खेल
मुकम्मल
हो
जाए
उस
को
ख़ंजर
जो
दिया
है
मुझे
सर
भी
देना
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Meraj Faizabadi
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जो
कह
रहे
थे
कि
जीना
मुहाल
है
तुम
बिन
बिछड़
के
मुझ
सेे
वो
दो
दिन
उदास
भी
न
रहे
Meraj Faizabadi
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