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Meer Taqi Meer
sirhaane meer ke koi na bolo
sirhaane meer ke koi na bolo | सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
- Meer Taqi Meer
सिरहाने
'मीर'
के
कोई
न
बोलो
अभी
टुक
रोते
रोते
सो
गया
है
- Meer Taqi Meer
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पत्ता
पत्ता
बूटा
बूटा
हाल
हमारा
जाने
है
जाने
न
जाने
गुल
ही
न
जाने
बाग़
तो
सारा
जाने
है
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इश्क़
क्या
क्या
आफ़तें
लाता
रहा
आख़िर
अब
दूरी
में
जी
जाता
रहा
मेहर
ओ
मह
गुल
फूल
सब
थे
पर
हमें
चेहरई
चेहरा
ही
वो
भाता
रहा
दिल
हुआ
कब
इश्क़
की
रह
का
दलील
मैं
तो
ख़ुद
गुम
ही
उसे
पाता
रहा
मुँह
दिखाता
बरसों
वो
ख़ुश-रू
नहीं
चाह
का
यूँँ
कब
तलक
नाता
रहा
कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
दाग़
था
जो
सर
पे
मेरे
शम्अ
साँ
पाँव
तक
मुझ
को
वही
खाता
रहा
कैसे
कैसे
रुक
गए
हैं
'मीर'
हम
मुद्दतों
मुँह
तक
जिगर
आता
रहा
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रोते
फिरते
हैं
सारी
सारी
रात
अब
यही
रोज़गार
है
अपना
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हम
भी
फिरते
हैं
यक
हशम
ले
कर
दस्ता-ए-दाग़-ओ-फ़ौज-ए-ग़म
ले
कर
दस्त-कश
नाला
पेश-रौ
गिर्या
आह
चलती
है
याँ
इल्म
ले
कर
मर्ग
इक
माँदगी
का
वक़्फ़ा
है
या'नी
आगे
चलेंगे
दम
ले
कर
उस
के
ऊपर
कि
दिल
से
था
नज़दीक
ग़म-ए-दूरी
चले
हैं
हम
ले
कर
तेरी
वज़-ए-सितम
से
ऐ
बे-दर्द
एक
आलम
गया
अलम
ले
कर
बारहा
सैद-गह
से
उस
की
गए
दाग़-ए-यास
आहु-ए-हरम
ले
कर
ज़ोफ़
याँ
तक
खिंचा
कि
सूरत-गर
रह
गए
हाथ
में
क़लम
ले
कर
दिल
पे
कब
इक्तिफ़ा
करे
है
इश्क़
जाएगा
जान
भी
ये
ग़म
ले
कर
शौक़
अगर
है
यही
तो
ऐ
क़ासिद
हम
भी
आते
हैं
अब
रक़म
ले
कर
'मीर'-साहिब
ही
चूके
ए
बद-अहद
वर्ना
देना
था
दिल
क़सम
ले
कर
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़
में
रोता
है
क्या
आगे
आगे
देखिए
होता
है
क्या
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