kharaabi kuchh na poochho mulakat-e-dil ki imarat ki | ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की

  - Meer Taqi Meer
ख़राबीकुछपूछोमुलकत-ए-दिलकीइमारतकी
ग़मोंनेआज-कलसुनियोवोआबादीहीग़ारतकी
निगाह-ए-मस्तसेजबचश्मनेइसकीइशारतकी
हलावतमयकीऔरबुनियादमयख़ानेकीग़ारतकी
सहर-गहमैंनेपूछागुलसेहाल-ए-ज़ारबुलबुलका
पड़ेथेबाग़मेंयक-मुशतपरऊधरइशारतकी
जलायाजिसतजल्ली-ए-जल्वा-गरनेतूरकोहम-दम
उसीआतिशकेपरकालेनेहमसेभीशरारतकी
नज़ाकतक्याकहूँख़ुर्शीद-रूकीकलशब-ए-महमें
गयाथासाएसाएबाग़तकतिसपरहरारतकी
नज़रसेजिसकीयूसुफ़सागयाफिरउसकोक्यासूझे
हक़ीक़तकुछपूछोपीर-ए-कनआँ'कीबसारतकी
तिरेकूचेकेशौक़-ए-तौफ़मेंजैसेबगूलाथा
बयाबाँमैंग़ुबार'मीर'कीहमनेज़ियारतकी
  - Meer Taqi Meer
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