ek parwaaz ko bhi ruksat-e-sayyaad nahin | एक पर्वाज़ को भी रुख़्सत-ए-सय्याद नहीं

  - Meer Taqi Meer
एकपर्वाज़कोभीरुख़्सत-ए-सय्यादनहीं
वर्नायेकुंज-ए-क़फ़सबैज़ा-ए-फ़ौलादनहीं
शैख़-ए-उज़्लततोतह-ए-ख़ाकभीपहुँचेगीबहम
मुफ़्तहैसैरकियेआलम-ए-ईजादनहीं
दादलेछोड़ूँमैंसय्यादसेअपनीलेकिन
ज़ोफ़सेमेरेतईंताक़त-ए-फ़रयादनहीं
क्यूँँहीमा'ज़ूरभीरखयूँँतोसमझदिलमेंशैख़
येक़दह-ख़्वारमिरेक़ाबिल-ए-इरशादनहीं
बे-सुतूँभीहैवहीऔरवहीजू-ए-शीर
थानमकशोहरत-ए-शीरींकासोफ़रहादनहीं
क्याकहूँ'मीर'फ़रामोशकियाउननेतुझे
मैंतोतक़रीबभीकीपरतूउसेयादनहीं
  - Meer Taqi Meer
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