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Meem Maroof Ashraf
sochta hooñ kya mira banta KHuda ke saamne
sochta hooñ kya mira banta KHuda ke saamne | सोचता हूँ क्या मिरा बनता ख़ुदा के सामने
- Meem Maroof Ashraf
सोचता
हूँ
क्या
मिरा
बनता
ख़ुदा
के
सामने
गर
न
होता
या
रसूल
अल्लाह
सहारा
आप
का
- Meem Maroof Ashraf
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पहले
पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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घी
मिस्री
भी
भेज
कभी
अख़बारों
में
कई
दिनों
से
चाय
है
कड़वी
या
अल्लाह
Nida Fazli
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हम
ऐसे
सुनते
हैं
उसकी
बातों
को
जैसे
कोई
सूफ़ी
गाने
सुनता
है
Tanoj Dadhich
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कभी
अल्लाह
मियाँ
पूछेंगे
तब
उनको
बताएँगे
किसी
को
क्यूँ
बताएँ
हम
इबादत
क्यूँ
नहीं
करते
Farhat Ehsaas
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मुझ
से
कहा
जिब्रील-ए-जुनूँ
ने
ये
भी
वही-ए-इलाही
है
मज़हब
तो
बस
मज़हब-ए-दिल
है
बाक़ी
सब
गुमराही
है
Majrooh Sultanpuri
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घर
से
मस्जिद
है
बहुत
दूर
चलो
यूँँ
कर
लें
किसी
रोते
हुए
बच्चे
को
हँसाया
जाए
Nida Fazli
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ये
मय-कदा
है
यहाँ
हैं
गुनाह
जाम-ब-दस्त
वो
मदरसा
है
वो
मस्जिद
वहाँ
मिलेगा
सवाब
Ali Sardar Jafri
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'मीर'
के
दीन-ओ-मज़हब
को
अब
पूछते
क्या
हो
उन
ने
तो
क़श्क़ा
खींचा
दैर
में
बैठा
कब
का
तर्क
इस्लाम
किया
Meer Taqi Meer
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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वो
अय्याम-ए-ग़म-ए-माज़ी
के
लम्हे
मिरे
आँसू
तिरा
आँचल
रहा
है
Meem Maroof Ashraf
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इश्क़
तौफ़ीक़
है
मगर
इक
तुम
इश्क़
को
मसअला
समझते
हो
Meem Maroof Ashraf
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हो
न
इतनी
भी
ख़ुदस
बे-ज़ारी
लगने
लग
जाए
ज़िन्दगी
भारी
लफ़्ज़
ये
हो
गए
हैं
बे-मानी
इश्क़-ओ-उलफ़त
मोहब्बत-ओ-यारी
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Meem Maroof Ashraf
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अन-गिनत
जिस्मों
की
सहूलत
थी
मुझ
को
पर
रूह
की
ज़रुरत
थी
जाने
कितने
ही
उस
पे
मरते
थे
जाने
कितनों
की
एक
चाहत
थी
वो
सिया
क़ल्ब
वाली
इक
लड़की
वाक़ई
कितनी
ख़ूब-सूरत
थी
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Meem Maroof Ashraf
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अब
के
बिछड़े
हैं
तो
ये
जी
में
है
आया
'क़ैसर'
अब
नहीं
जीना
यहाँ
जाँ
से
गुज़र
जाना
है
Meem Maroof Ashraf
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