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Meem Maroof Ashraf
kursi pankha hai aur rassi hai
kursi pankha hai aur rassi hai | कुर्सी पंखा है और रस्सी है
- Meem Maroof Ashraf
कुर्सी
पंखा
है
और
रस्सी
है
और
ख़ाली
है
मेरा
कमरा
भी
- Meem Maroof Ashraf
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वो
मेरे
हाल
से
वाक़िफ़
है
फिर
भी
मुस्कुराता
है
मैं
कैसे
मान
लूँ
उस
को
मिरे
हालात
का
ग़म
है
Meem Maroof Ashraf
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उजाला
खो
गया
है
और
अँधेरा
छा
गया
जानाँ
सज़ा
मैं
इश्क़
की
यानी
मुकम्मल
पा
गया
जानाँ
मज़े
जो
तेरी
क़ुर्बत
के
थे
सारे
भूल
बैठे
हैं
मज़ा
फ़ुर्क़त
में
तेरी
हम
को
इतना
आ
गया
जानाँ
ये
कैसा
याद
आना
है
ख़ुदारा
याद
मत
आना
कि
तेरा
याद
आना
ज़ेहन
मेरा
खा
गया
जानाँ
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Meem Maroof Ashraf
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निहायत
इश्क़
है
उस
को
भी
'अशरफ़'
मगर
मुझ
से
नहीं
ये
खल
रहा
है
Meem Maroof Ashraf
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वो
ज़न-ए-ख़ास,
ख़ास
है
कब
तक
जब
तलक
जाँ
में
जान
है
तब
तक
कह
ही
देता
हूँ
इश्क़
है
तुम
से
बात
आ
ही
गई
है
जब
लब
तक
कौन
होता
है
आज
कल
किस
का
गरचे
हो
भी
तो
अपने
मतलब
तक
कुछ
तो
अपना
भी
हम
ख़याल
करें
सोचते
ही
रहें
तुम्हें
कब
तक
रास
आ
जाए
जिस
को
मैख़ाना
कैसे
पहुँचे
वो
शैख़-साहब
तक
एक
औरत
को
चाहते
"अशरफ़"
हो
गए
दस
बरस
हमें
अब
तक
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Meem Maroof Ashraf
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है
नाम
से
मंसूब
जहाँ
भर
में
तू
मेरे
जाएगा
कहाँ
मुझ
से
तू
दामन
को
छुड़ा
कर
Meem Maroof Ashraf
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