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Meem Maroof Ashraf
chhod do mujh ko chaahne ki zid
chhod do mujh ko chaahne ki zid | छोड़ दो मुझ को चाहने की ज़िद
- Meem Maroof Ashraf
छोड़
दो
मुझ
को
चाहने
की
ज़िद
क्या
अबस
सोचती
रहोगी
मुझे
जान
कर
ये
कि
बे-वफ़ा
था
मैं
कब
तलक
कोसती
रहोगी
मुझे
- Meem Maroof Ashraf
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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मैंने
अपनी
ग़ज़लें
खारिज
कर
डाली
सोचो
मेरी
जान
तुम्हारा
क्या
होगा
Talib Toofani
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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तुम्हें
हुस्न
पर
दस्तरस
है
मोहब्बत
वोहब्बत
बड़ा
जानते
हो
तो
फिर
ये
बताओ
कि
तुम
उस
की
आँखों
के
बारे
में
क्या
जानते
हो
ये
जुग़राफ़िया
फ़ल्सफ़ा
साईकॉलोजी
साइंस
रियाज़ी
वग़ैरा
ये
सब
जानना
भी
अहम
है
मगर
उस
के
घर
का
पता
जानते
हो
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Tehzeeb Hafi
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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चाहे
हो
आसमान
पे
चाहे
ज़मीं
पे
हो
वहशत
का
रक़्स
हम
ही
करेंगे
कहीं
पे
हो
दिल
पर
तुम्हारे
नाम
की
तख़्ती
लगी
न
थी
फिर
भी
ज़माना
जान
गया
तुम
यहीं
पे
हो
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Nirmal Nadeem
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अपने
होटों
की
ये
तहरीर
रखो
अपने
पास
हम
वो
'आशिक़
हैं
जो
आँखों
को
पढ़ा
करते
हैं
Meem Alif Shaz
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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मेरी
ही
जान
के
दुश्मन
हैं
नसीहत
वाले
मुझ
को
समझाते
हैं
उन
को
नहीं
समझाते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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आइना
देखता
रहा
मुझ
को
उसको
पर
मैं
नज़र
नहीं
आया
Meem Maroof Ashraf
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हू-ब-हू
जौन
की
सी
हालत
है
जौन
वो
एलिया
समझते
हो
इश्क़
तुम
को
मज़ाक़
लगता
है
तुम
मोहब्बत
को
क्या
समझते
हो
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Meem Maroof Ashraf
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कीजे
फिर'औन
से
शद्दाद
से
इबरत
हासिल
ज़ेर
ये
हो
गए
सारे
जो
ज़बर
जाना
है
Meem Maroof Ashraf
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बहुत
ग़ुरूर
था
तुम
को
हसीन
होने
पर
हमें
भी
नाज़
कि
तुमको
भुला
दिया
हम
ने
Meem Maroof Ashraf
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ख़ाक
को
ख़ाक
में
मिलाते
हुए
अच्छा
लगता
है
ज़ख़्म
खाते
हुए
ज़िक्र
होता
है
दोस्तों
में
तिरा
सिगरेटों
का
धुआँ
उड़ाते
हुए
भूल
जाता
है
बे-वफ़ाई
को
अपने
औसाफ़
वो
गिनाते
हुए
कौन
साँसें
तिरी
बढ़ाता
है
जिस्म
पर
उँगलियाँ
फिराते
हुए
तुझ
से
तो
यूँँ
ही
कह
रहा
था
बस
अच्छी
लगती
है
खिलखिलाते
हुए
यारों
जा
कर
के
उस
को
समझाओ
खो
न
दे
मुझ
को
आज़माते
हुए
हम
को
हरगिज़
न
ख़ुश
समझ
लेना
गरचे
रहते
हैं
मुस्कुराते
हुए
साम'ईं
वाह
वाह
करते
रहे
रो
पड़ा
मैं
ग़ज़ल
सुनाते
हुए
उस
का
जाना
अजीब
था
'क़ैसर'
ख़ुद
भी
रोया
मुझे
रुलाते
हुए
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Meem Maroof Ashraf
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