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Meem Maroof Ashraf
koii bhi chaal mere haq men nahin
koii bhi chaal mere haq men nahin | कोई भी चाल मेरे हक़ में नहीं
- Meem Maroof Ashraf
कोई
भी
चाल
मेरे
हक़
में
नहीं
सूरत-ए-हाल
मेरे
हक़
में
नहीं
वो
गुज़श्ता
दिनों
मुयस्सर
था
ये
मह-ओ-साल
मेरे
हक़
में
नहीं
गर्दिश-ए-बख़्त
का
तसल्लुत
है
कुछ
भी
फिलहाल
मेरे
हक़
में
नहीं
कैसे
ख़ुशियाँ
मनाऊँ
तेरे
बग़ैर
ईद-ए-शव्वाल
मेरे
हक़
में
नहीं
- Meem Maroof Ashraf
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यूँँ
सिमट
जाओ
मेरी
बाँहों
में
चाह
कर
भी
न
फिर
निकल
पाओ
या
तो
फिर
छोड़
दो
मुझे
यकसर
या
मुकम्मल
ही
मेरे
हो
जाओ
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देख
कर
उस
को
जब
ये
आलम
है
उस
को
छूने
के
बाद
क्या
होगा
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इतना
कहना
था
कोई
है
मेरा
हर
तरफ़
गर्दिशें
निकल
आईं
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मिस्ल-ए-का'बा
था
तुझ
को
क्या
मालूम
वो
मकाँ
तू
ने
जो
गिरा
डाला
Meem Maroof Ashraf
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ग़म
में
दिल
मुब्तला
नहीं
होता
अब
तिरा
तज़्किरा
नहीं
होता
कुछ
न
कुछ
वास्ता
तो
रहता
है
जिस
से
कुछ
वास्ता
नहीं
होता
तुम
नहीं
जानते
मोहब्बत
में
फ़ासला,
फ़ासला
नहीं
होता
किस
तरह
दोस्तों
को
समझाऊँ
उस
से
अब
राब्ता
नहीं
होता
सब
को
हैरत
है
मेरी
हालत
पर
मैं
कि
हैरत-ज़दा
नहीं
होता
कैसे
कह
दूँ
उसे
मोहब्बत
है
वो
तो
मुझ
से
ख़फ़ा
नहीं
होता
ज़ख़्म-ए-उल्फ़त
वो
ज़ख़्म
है
जिस
में
कोई
मरहम
दवा
नहीं
होता
लाख
करता
हूँ
कोशिशें
"अशरफ़"
तर्क-ए-अहद-ए-वफ़ा
नहीं
होता
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Meem Maroof Ashraf
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