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Manohar Shimpi
naam kyuuñ phir KHuda ka bhulaaye koii
naam kyuuñ phir KHuda ka bhulaaye koii | नाम क्यूँ फिर ख़ुदा का भुलाए कोई
- Manohar Shimpi
नाम
क्यूँ
फिर
ख़ुदा
का
भुलाए
कोई
जश्न
बुत
में
दियों
से
मनाए
चलो
- Manohar Shimpi
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ज़िंदगी
अपनी
जब
इस
शक्ल
से
गुज़री
'ग़ालिब'
हम
भी
क्या
याद
करेंगे
कि
ख़ुदा
रखते
थे
Mirza Ghalib
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जिस
ने
इस
दौर
के
इंसान
किए
हैं
पैदा
वही
मेरा
भी
ख़ुदा
हो
मुझे
मंज़ूर
नहीं
Hafeez Jalandhari
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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आसमाँ
में
है
ख़ुदा,
क्या
सब
दुआएंँ
आसमाँ
तक
जा
रही
हैं
मेरी
इक
फ़रयाद
पूरी
हो
तो
मैं
मानूँ
वहाँ
तक
जा
रही
हैं
Saahir
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वक़्त
ए
इफ़्तार
ख़ुद
रब
था
मेरे
क़रीब
तुझ
से
बढ़
कर
मगर
कुछ
न
माँगा
गया
Afzal Ali Afzal
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ख़ुदा
ख़ुदको
समझते
हो
तो
समझो
मगर
इक
रोज़
मर
जाना
है
तुमको
Shakeel Azmi
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देवताओं
का
ख़ुदास
होगा
काम
आदमी
को
आदमी
दरकार
है
Firaq Gorakhpuri
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बना
कर
हमने
दुनिया
को
जहन्नुम
ख़ुदा
का
काम
आसाँ
कर
दिया
है
Rajesh Reddy
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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के
'हैलो'
सुनते
ही
कट
कर
दिया
है
उसने
मेरा
फ़ोन
ख़ुदा
का
शुक्र
है
आवाज़
तो
पहचानता
है
वो
Zubair Ali Tabish
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बुरी
बात
का
क्यूँँ
न
इनकार
करना
हमेशा
सदाक़त
का
इक़रार
करना
खुले
आसमाँ
में
करे
जो
मुहब्बत
सभी
काश
कहते
उसे
प्यार
करना
ज़माने
मिसालें
किसे
अब
पता
हैं
ज़माने
की
रंगत
का
इक़रार
करना
हिफ़ाज़त
भरी
वो
नज़र
और
ही
है
पता
है
निगाहों
से
रुख़्सार
करना
बग़ावत
अदावत
करे
जो
हमेशा
उसे
ख़ूब
आता
है
तलवार
करना
बहारें
नज़ारे
बहारें
नज़ारे
कभी
हम-नशीं
का
ही
दीदार
करना
बयाँ
जो
किया
है
किसी
ने
ग़लत
तो
उसी
बात
का
फिर
तिरस्कार
करना
निगाहें
ज़ुबाँ
की
समझ
है
'मनोहर'
किसी
अजनबी
से
न
तकरार
करना
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Manohar Shimpi
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आक़िबत
से
कहाँ
गिला
ही
है
कश्मकश
से
सही
मिला
ही
है
चाहिए
वो
हमें
कहाँ
मिलता
जो
मिला
वो
लगे
सिला
ही
है
कोई
शिकवा
नहीं
रहा
लेकिन
दोस्तों
एक
इब्तिला
ही
है
ऐ
फ़साना
कहाँ
शब-ए-ग़म
है
हिज्र
में
साथ
फिर
मिला
ही
है
चाँदनी
रात
है
पता
मुझ
को
चाँद
है
कौन
इत्तिला
ही
है
दोस्त
है
एक
ही
'मनोहर'
अब
इक
अकेला
जो
काफ़िला
ही
है
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Manohar Shimpi
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मिलो
रोज़
दिल
में
कई
हसरते
हैं
न
हसरत
बदलते
न
ही
हम
बदलते
Manohar Shimpi
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क्या
तिलिस्म-ए-मजाज़
है
यारों
कोई
तो
दिल-नवाज़
है
यारों
ख़ून
का
रंग
एक
ही
है
जब
कैसे
फिर
इम्तियाज़
है
यारों
ढूॅंढ़ते
हम
रहे
जिसे
थे
वो
हम
सेफ़र
जाँ-नवाज़
है
यारों
कौन
छोटा
बड़ा
ख़ुदा
जाने
एक
उसका
नियाज़
है
यारों
माँ
तेरे
ही
बग़ैर
क्या
जीना
कौन
फिर
अब
नवाज़
है
यारों
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Manohar Shimpi
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सच
ग़लत
का
तलबगार
है
ही
नहीं
इसलिए
कोई
तकरार
है
ही
नहीं
शक्ल
सूरत
लगे
और
ही
कुछ
तभी
मरकज़ी
है
वो
किरदार
है
ही
नहीं
इश्क़
का
रंग
जब
और
भद्दा
लगे
बे-वफ़ा
है
वफ़ादार
है
ही
नहीं
बद-म'आशी
जहाँ
पर
कहीं
भी
रहे
फिर
वहाँ
कोई
सरकार
है
ही
नहीं
इश्क़
पर
ही
लिखी
है
"मनोहर"
ग़ज़ल
क्या
मुहब्बत
करे
प्यार
है
ही
नहीं
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Manohar Shimpi
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