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Manohar Shimpi
intiqaam se pukaarta raha kabhi koi
intiqaam se pukaarta raha kabhi koi | इंतिक़ाम से पुकारता रहा कभी कोई
- Manohar Shimpi
इंतिक़ाम
से
पुकारता
रहा
कभी
कोई
रोष
ख़ूब
ही
उतारता
रहा
कभी
कोई
- Manohar Shimpi
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एक
बख़्यागर
कहे
कैसा
ज़माना
आ
गया
कोई
ठग
अहद-ए-रिया
में
आशियाना
खा
गया
Manohar Shimpi
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ख़्वाहिशों
से
वो
कहाँ
इन
के
हुए
छोड़
के
फिर
साथ
कमसिन
के
हुए
रात
भी
मुश्किल
से
कटती
हिज्र
में
चाँद
तारे
अर्श
के
गिन
के
हुए
बेच
के
कूड़ा
चलाते
घर
कोई
एक
सौ
रुपए
कभी
दिन
के
हुए
हुस्न
ला-फ़ानी
नहीं
है
हम-सफ़र
देख
के
इक
ही
दफ़ा
सिन
के
हुए
उस
बलंदी
पर
कभी
हम
भी
रहे
टूट
के
फिर
रात
क्या
दिन
के
हुए
दौर
था
कैसा
'मनोहर'
ख़ूब
वो
फ़ासलों
से
हम-नफ़स
जिन
के
हुए
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Manohar Shimpi
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किसी
आँखों
में
क्या
हम
को
नज़र
आता
उसी
में
आसमाँ
दरिया
समा
जाता
Manohar Shimpi
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कामयाबी
से
फली
फूली
मुहब्बत
है
तेरी
हम
सेफ़र
के
साथ
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
तेरी
Manohar Shimpi
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आइना
अक्स
ही
बताता
है
बात
दिल
की
कहाँ
छिपाता
है
जब
कोई
शे'र
इश्क़
का
पढ़ता
सिर्फ़
तेरा
ख़याल
आता
है
एक
चेहरे
पे
हों
अगर
चेहरे
मुँह
से
फिर
कौन
सच
बताता
है
दर्द
मज़दूर
का
किसे
दिखता
कर्ब
उस
का
वही
जताता
है
कोई
नादान
तब्सिरा
क्यूँँ
दे
इल्म
बेकार
का
दिखाता
है
लोग
भी
हाथ
कम
दिखाते
अब
कौन
काहिन
सही
बताता
है
राज़
क्या
है
बड़ा
मनोहर
वो
एहतियातन
कहा
न
जाता
है
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Manohar Shimpi
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